Friday, December 23, 2016

पैर है लेकिन नीचे जमीन नहीं है

सुनील कुमार
आज पृथ्वी पर एक अनुमान के मुताबिक 750 करोड़ आबादी रहती है। इस आबादी के एक प्रतिशत ऐसे लोग हैं जो 99 प्रतिशत सम्पत्ति के मालिक बने हुये हैं। इस सम्पत्ति को बनाये व छुपाये रखने के लिये लोगों को किसी न किसी रूप से आपस में लड़ाते रहते हैं जिसके कारण जाति, नस्ल, क्षेत्र, धर्म के नाम पर लड़ाई होती रहती है। इस लड़ाई में कुछ लोगों को अपने जान-माल से हाथ धोना पड़ता है तो कुछ अपनी जिन्दगी को बचाने के लिये अपनी जीविका के साधन को छोड़कर पृथ्वी के दूसरे हिस्से में चले जाते हैं। शरणार्थियों के लिये काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर के मुताबिक प्रतिदिन 36,000 लोगों को जबरन विस्थापित होना पड़ता है। अब तक 6,53,00,000 लोगों को जबरन विस्थापित कर दिया गया जिसमें से 18 वर्ष तक के करीब 50 प्रतिशत लोग हैं। इसमें से एक करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास किसी देश की नागरिकता नहीं है और वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आने-जाने की आजादी जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

बर्मा में रोहिंग्या समुदाय
भारत के पड़ोसी देश बर्मा से लाखों की संख्या में रोहिंग्या श्रीलंका, थाईलैंड, इंडोनेशिया, मलेशिया, बांग्लादेश, भारत सहित कई देशों में शराणार्थी के रूप में रह रहे हैं। 2014 की जनगणना के अनुसार बर्मा की जनसंख्या 5.5 करोड़ के आस-पास थी जिसमें 87.9 प्रतिशत बौद्ध, 6.2 प्रतिशत क्रिश्चियन, 4.3 प्रतिशत इस्लामी, .5 प्रतिशत हिन्दू तथा .8 प्रतिशत आदिवासी हैं। रोहिंग्या समुदाय को बर्मा की नागरिकता प्राप्त नहीं हैं। बौद्ध उनको बाहर से आये हुये बताते हैं जबकि रोहिंग्या समुदाय का इतिहास बर्मा में सैकड़ों वर्ष पुराना है। 2010 के चुनाव में रोहिंग्या समुदाय ने वोट डाला था, उसके बाद उनसे वोट डालने का अधिकार भी छीन लिया गया। रोहिंग्या पर अनेकों तरह के जुल्म होते रहते हैं जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने रोहिंग्या को दुनिया के सबसे अधिक उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों में से एक माना है। रोहिंग्या को बर्मा में एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिये पुलिस से परमिशन की जरूरत होती है, यहां तक कि इलाज तथा शादी तक के लिये भी परमिशन लेना होता है। जानवरों के बच्चे पैदा करने से लेकर मरने तक की सूचना पुलिस थाने में दर्ज करानी पड़ती है। जानवरों के मरने या घर जल जाने पर भी सरकार को रोहिंग्या समुदाय हर्जाना देता है। फसलों का एक हिस्सा सरकार को देना पड़ता है। सैनिक उनको अपने ठिकानों पर ले जाकर काम करवाते हैं, पहरा दिलवाते हैं जहां पर उनको हमेशा जागना होता है। थोड़ी सी आंख लगने पर उनके साथ अमानवीय बर्ताव किये जाते हैं तथा हर्जाना वसूला जाता है। महिलाओं के साथ बलात्कार आम बात है। एक अनुमान के मुताबिक रखाइन प्रांत में रोहिंग्या की आबादी करीब दस लाख है जो और प्रांतों से सबसे ज्यादा है। तीन दशक बाद 2014 में जब बर्मा की जनगणना हुई तो अधिकारियों ने रोहिंग्या मुसलमान के नाम पर जनगणना करने से मना कर दिया और कहा कि वह अपने आप को बंगाली मुसलमान पंजीकृत करवाएं, अन्यथा उनका पंजीकरण नहीं किया जायेगा। 2012 में करीब एक लाख लोग विस्थापित हुये और टाईम पत्रिका के अनुसार करीब 200 लोग मारे गये। बांग्लादेश जाते समय लगभग 120 लोग नाव पलटने से मारे गये।

रोहिंग्या राइट्स ऑर्गनाइजेशन के अराकन प्रॉजेक्ट के डायरेक्टर क्रिस लीवा का कहना है कि 19 अक्टूबर, 2016 को सुरक्षा बलों द्वारा एक ही गांव की करीब 30 महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। 20 अक्टूबर को दो लड़कियों तथा 25 अक्टूबर को दूसरे गांव में 16 से 18 वर्ष की पांच लड़कियों के साथ बलात्कार किया गया। बांग्लादेश में यूएनएचसीआर के प्रमुख जॉन मैकइस्सिक ने कहा है कि सुरक्षा बल रोहिंग्या समुदाय के पुरुषों और बच्चों की हत्याएं कर रहे हैं, महिलाओं से बलात्कार कर घरों को आग लगा रहे हैं। ह्यूमन राइट्स वाच ने कुछ जले हुए गांवों की तस्वीरें जारी की हैं जिसके अनुसार 430 घरों को जलाया गया है। सेना हेलीकाप्टरों से गोलियां बरसा रही है। इन दावों के उलट बर्मा के अधिकारियों का कहना है कि रोहिंग्या खुद अपने घरों को आग लगा रहे हैं। रखाइन प्रांत में मीडिया और राहतकर्मियों के जाने पर पाबंदी लगा दी गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने हाल ही में अपने बयान में रोहिंग्या की स्थिति पर चिंता जताई और आंग सान सू ची से कहा है कि रखाइन प्रांत का दौरा कर वहां के लोगों से सीधी बात करें। एक अनुमान के मुताबिक अब तक बर्मा में लगभग बीस हजार रोहिंग्या मारे जा चुके हैं।

शरणार्थी के रूप में रोहिंग्या
बर्मा में हो रहे उत्पीड़न से बचकर जब रोहिंग्या बांग्लादेश या अन्य देशों को जाते हैं तो वहां भी इनके साथ लूट-खसोट किया जाता है। बांग्लादेश से भारत में आने के लिये इनको दलालों की मदद लेनी पड़ती है। दलाल इनको बॉर्डर पार कराने के लिये आठ से दस हजार रू. प्रति व्यक्ति लेते हैं। जम्मू में रहने वाली शाजिया बताती है कि जब वह बांग्लादेश से भारत में आई तो दलाल उनके परिवार से आठ हजार रू. प्रति व्यक्ति लिया,साथ ही सुरक्षा के नाम पर महिलाओं के जेवरात उतरवा कर अपने पास रख लिये और उनको छोड़कर रातों-रात भाग गया। इसी तरह की कहानी सभी रोहिंग्या के साथ घटित हुई। रोहिंग्या समुदाय के लोग बताते हैं कि कभी-कभी बॉर्डर पार करने में उनका परिवार का साथ छूट जाता है या पैसा कम होने पर दलाल परिवार के किसी महिला को अपने साथ रख लेता है और उनको किसी के हाथ बेच देता हैं। इतनी कठिन परिस्थितियों में जब वह भारत जैसे देश में 8 बाई 10 के झोपड़ीनुमा किराये के मकान में रहते हैं तो उनको आजादी मिलती है कि वह भारत में कहीं भी आ जा सकते हैं। भारत में आने के बाद रोहिंग्या ज्यादातर दिहाड़ी मजदूरी और खेती का काम करते हैं। कुछ लोग जानवरों के देखभाल या ऑफिस,मॉल व घरों में सफाई का काम करने लगते हैं। इनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि इन्हें प्रतिदिन काम नहीं मिलता है। हरियाणा जैसे जगह पर खेतों में काम कराने के बाद मनमर्जी मजदूरी दी जाती है।

रोहिंग्या समुदाय की संघर्षपूर्ण जिन्दगी में और भी दिल दहला देने वाली घटनायें होती रहती हैं, जैसा कि 25-26 नवम्बर की रात जम्मू के नरवाल में रोहिंग्या बस्ती में आग लग गई। 83 घरों में से 56 घर धू-धू कर जल उठे। जिसके जिस्म पर जो कपड़े थे वही पहने हुये जान बचाने के लिये बाहर भागे और अपनी आंखों के सामने अपने घरों को जलते हुये असहाय रूप से देखते रहे। इन्हीं परिवारों में से एक परिवार इस आग की भेंट चढ़ गया। जोहरा हथुन बेवा हैं, वह अपनी बेटी और बेटों के साथ इसी बस्ती में 4 साल से रह रही हैं। उनकी बेटी नुनार (25 साल) अपने पति सलीम और दो बच्चे रूबिना अख्तर (8 साल) व रूसिना अख्तर (डेढ़ साल) के साथ इस बस्ती में हंसी-खुशी रहती थी। नुनार ने अपनी बहन नुरूसबा की बेटी तस्मीन (17 साल) को अपने घर पर सोने के लिये बुला लिया था। इस आग में नुनार, सलीम, रूसिना व तस्मीन की जलने से मौत हो गई, जबकि रूबिना अस्पताल में जिन्दगी और मौत के बीच जूझ रही है। सलीम सात हजार की नौकरी कर अपना परिवार चलाते थे। अपने बेटी, दामाद और बच्चों के गम ने जोहरा हाथुन को इतना तोड़ दिया है कि उस दिन के बाद से उनके आंख में आंसू ही दिखते हैं। इस बस्ती में एक मदरसा है वह भी आग की भेंट में चढ़ चुका है। मौलवी मुहम्मद रफीक बताते हैं कि इस मदरसे में 100 से अधिक बच्चे पढ़ते हैं जो दूसरे बस्ती से भी पढ़ने के लिये आया करते थे। मदरसा में काफी राशन और समान था जो आग में जल चुका है, जिसका मूल्य लगभग दस लाख रू. है।

इस बस्ती में रहने वाले सबीक ने बताया कि वह बर्मा में खेती करते थे। उनके चार भाई थे। तीन भाईयों और पिता को जेल में बर्मा की सरकार ने मार दिया तो वे भाग कर यहां आ गये। सबीक बताते हैं कि बस्ती जलने पर एनजीओ और अन्य लोगों ने उनकी मदद की, लेकिन मृत परिवार को सरकार की तरफ से अभी तक कोई मुआवजा नहीं मिला है और न ही सरकार ने पीड़ित परिवार को बताया है। शब्बीर अहमद अपने पत्नी और बच्चे के साथ इसी बस्ती में रहते हैं। उनके परिवार के कुछ सदस्य बर्मा में रहते हैं। शब्बीर ने बताया कि उनके पास पैर है लेकिन पैर के नीचे जमीन नहीं है। वह बताते हैं कि घर से फोन आया था कि वे लोग छह दिन से भूखे हैं, पैसे मांग रहे थे। पास में खड़ी एक महिला ने कहा कि ‘‘हमें सरकार से झुग्गी चाहिये बस, अल्लाह का बहुत बड़ा शुक्रिया होगा’’। इन लोगों का कहना है कि बर्मा में भी हिन्दुस्तान की तरह लोग मिल-जुल कर रहें, वहां भी डेमोक्रेसी हो जाये और हमें नागरिक का अधिकार मिल जाये तो हम बर्मा जा सकते हैं। वे चाहते हैं कि भारत सरकार उनकी समस्याओं को सुलझाने के लिये पहल करे। उनका कहना था कि हम यहां झुग्गी जल जाने पर भी शकुन से हैं वहां तो मां के सामने बेटियों के साथ बलात्कार किया जाता है।

यूएनसीएचआर की सहयोगी संस्था दाजी (डेवलपमेंण्ड एण्ड जस्टिस इनिशिएटिव) के निदेशक रवि हेमाद्री ने बताया कि भारत में रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या लगभग दस हजार के करीब हैं, जो राजस्थान के जयपुर, दिल्ली, हैदराबाद, तामिलनाडु, उत्तर प्रदेश के मेरठ, अलीगढ़ और सहारनपुर में छोटी संख्या में तथा हरियाणा के मेवात और जम्मू के नरवाल, भठिंडा में ज्यादा संख्या में हैं। दाजी, यूएनसीएचआर के साथ मिलकर इनके स्वास्थ्य और शिक्षा के लिये काम करता है। दाजी निदेशक के अनुसार रोहिंग्या के लोग ज्यादातर टीवी और मलेरिया की बीमारी ग्रसित हैं।

जब ये शरणार्थी इतनी मुश्किल से भारत में रह रहे हैं व भारत को एक मॉडल के रूप में देख रहे है और उनकी कल्पना है कि बर्मा भी ऐसा देश बने, तब भारत का राष्ट्रीय हिन्दी न्यूज पेपर 18 दिसम्बर को एक मनगढंत कहानी बनाता है- ‘‘सुरक्षा के लिये खतरे की घंटी है, रोहिंग्या समुदाय की बढ़ती तदाद’’ और उनको पाकिस्तान के साथ लिंक करता है। यह न्यूज पेपर इनकी समस्याओं और उनके समाधान पर बात नहीं करता। क्या वह न्यूज पेपर यह चाहता है कि वे लोग बर्मा में रहें और मारे जाते रहें?

विश्व में बौद्ध धर्म अपने अहिंसक प्रवृत्ति, सहिष्णुता व करूणा के लिये जाना जाता है। बर्मा में बौद्ध धर्म मानने वालों का शासन है, उसके बाद भी बर्मा में रोहिंग्या समुदाय को प्रताड़ना सहनी पड़ रही है। बौद्ध धर्म अपने को अहिंसक कहता है परन्तु उनका शिष्य बुद्ध के उपदेशों को छोड़कर आज हिंसा पर उतारू हो चुका है। बर्मा में उनके द्वारा किये गये जुल्मों के कारण ही संयुक्त राष्ट्र संघ को कहना पड़ा है कि दुनिया में सबसे ज्यादा पीड़ित रोहिंग्या समुदाय है। दुनिया को ‘शांति’ का पाठ पढ़ाने वाले दलाई लामा इस विषय पर चुप क्यों हैं? शांति के नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की अपने देश में ही इस तरह की अशांति पर चुप्पी का कारण क्या है? भारत की मीडिया इतनी बड़ी घटना को तरजीह नहीं देती है, उलटे उस पर ही सवाल खड़ी कर रही है। क्या दुनिया के सभी मानवाधिकार प्रेमी संगठनों/व्यक्तियों का कर्तव्य नहीं है कि रोहिंग्या पर हो रहे उत्पीड़न के लिए बोलें, लिखें?

Thursday, December 8, 2016

ठंड की दस्तक बेघर हुए लोग

सुनील कुमार
दिल्ली की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी झुग्गी-झोपड़ियों व कच्ची कालोनियों में रहती है। इन्हीं बस्तियों में शहरों के निर्माण करने वाले मजदूर से लेकर शहर को चलाने वाले व सफाई करने वाली आबादी बसी हुई है। इन्हीं में से एक बस्ती है रिठाला की बंगाली बस्ती। इस बस्ती में रहने वाले लोग पश्चिम बंगाल के बीरभूम, मुर्शिदाबाद, बर्धमान, मालदा जिले से हैं। इस बस्ती में 95 प्रतिशत परिवार घरों से कूड़ा उठाने से लेकर सड़कों, गलियों, मुहल्लों, कचरा स्थल से कूड़ा उठा कर दिल्ली को स्वच्छ बनाने का काम करते हैं। इस स्वच्छता के लिये उनको कोई पारिश्रमिक भी नहीं मिलता वह कूड़े से मिले हुये प्लास्टिक की बोतलें, प्लास्टिक, शीशे, कागज, गत्ता, लोहे को छांट कर अपनी जीविका चलाते हैं। यह रास्ते, घरों से उठाये कूड़े को अपने घर में लाते हैं और छंटाई करने के बाद उसको हफ्ते-दो हफ्ते बाद बेच देते हैं। एक अनुमान के मुताबिक 300 टन कूड़ा प्रति माह यह बस्ती वाले इक्ट्ठा करते हैं। इस बस्ती की महिलायें दूसरों के घरों में सफाई का काम करती हैं। यह बस्ती रिठाला मेट्रो स्टेशन से 300 मीटर दूर तथा एक कि.मी. की दूरी पर राजीव गांधी केंसर अस्पताल और डॉ. भीम राव अम्बेडकर अस्पताल के पास बसी हुई है। बस्ती से एक कि.मी. से भी कम दूरी पर दमकल केन्द्र है। बस्ती के एक तरफ बहुमंजिली फ्लैट्स बनाये जा रहे हैं तो दूसरी तरफ रिठाला गांव हैं, इसी गांव के कुछ लोगों द्वारा इस बस्ती वालों से 2000 से 2500 रू. प्रति झुग्गी प्रति माह किराया वसूला जाता है।

4-5 दिसम्बर की मध्यरात्री रिठाला बंगाली बस्ती में लगभग 600 झुग्गियां धूं-धूं कर जल उठी। इस आग में लोगों की कड़ी मेहनत से जोड़ी गई पाई-पाई का सामान जल कर खाक हो गया। ऐसा नहीं है कि इस बस्ती में पहली बार आग लगी हो इससे पहले भी 5 अप्रैल, 2011 को आग लग चुकी है जिसमें लोगों की मेहनत की कमाई तबाह हो गई थी। बस्ती वाले बताते हैं कि इस बार तो टेंट और खाने का सामान मिल भी गया लेकिन इसके पहले जो आग लगी थी उसमें हमें कुछ नहीं मिला था और मीडिया वालों को गांव वाले भगा दिये थे।

इस बस्ती में किराने के दुकान चलाने वाले मुराशाली जिनको बस्ती के लोग पाखी कहते हैं। पाखी तीन बच्चों और पत्नी के साथ रहते हैं उनके पत्नी और बच्चे आठ नवम्बर से गांव गये हुये हैं। पाखी बताते हैं कि वह 15 साल की उम्र में 1996 से इस बस्ती में रहते हैं। शुरूआत में वह कबाड़ चुनने का काम करते थे कबाड़ चुनने से जो पैसा इक्ट्ठा हुआ उससे किराने की दुकान खोल लिये, कुछ और पैसा इक्ट्ठा कर एक साल पहले ई-रिक्शा खरीद लिये थे। पत्नी दुकान चलाती थी वह ई-रिक्शा चलाते थे। बताते हैं कि दुकान में रखे 26 हजार के पुराने नोट सहित सभी समान जल कर खाक हो गये। पाखी सोच रहे थे कि बैंकों में भीड़ कम हो तो पुराना नोट जाकर जमा करायें। आग लगने के बाद वह दुकान में गये और केवल पुराना मोबाईल फोन ही निकाल पाये। वह अपनी जली हुई फ्रिज की तरफ देखते हुये कहते हैं कि फ्रिज नया ही था अभी दो महीना पहले उसका किश्त खत्म हुआ था। इस आग में उनका ई-रिक्शा भी जलकर स्वाहा हो गया। पाखी का कहना है कि जहां वह पन्द्रह साल पहले थे फिर से वहीं आकर खड़े हो गये। वह बताते हैं कि जो किराया लेता है वह हम लोगों का आधार कार्ड और 300 रू. लेकर गया था कि एग्रीमेंट बना कर देंगे लेकिन कभी उसने दिया नहीं। पाखी नहीं चाहते कि हम कबाड़ चुने तो हमारे बच्चे भी कबाड़ चुने। उनके तीनों बच्चे दसवीं, नवीं और छठवीं में पढ़ते हैं।

अशिलदुल शेख का जन्म इसी झुग्गी में हुआ था जिनकी उम्र अभी 22 साल हैं। वह रोहीणी सेक्टर 4 वार्ड नं. 44 से कूड़ा उठाने का काम करते हैं और उनके पिताजी रिक्शा चलाते हैं। अशिलदुल शेख बताते हैं कि यह बस्ती पहले ऐसी नहीं थी, यहां पहले काफी गड्ढ़ा था पानी भर जाता था, काफी जंगल था हम लोग जंगल में टॉयलेट के लिये जाया करते थे। लोगों ने धीरे-धीरे अपने घरों को मलवे भर-भर कर ऊंचा किया। जंगल काट कर यह सब बिल्डिंग बन गई तो घर के पास ही गड्ढ़ा खोद कर टॉयलेट बना लिया। पानी के लिये नल लगा लिये तब कहीं जाकर हम यहां रह पाते हैं।

चौथी क्लास में पढ़ने वाली सोनाली को आशा है कि ठंड से बचने के लिये नानी के घर से कपड़े आयेंगे। सोनाली कि सभी किताब, कॉपी जल चुकी है, वह कहती है कि 3-4 दिन बाद जाकर स्कूल में पता करेगी कि कैसे पढ़ाई हो पायेगी। सोनाली के पिता पिंकु कबाड़ गोदाम में छंटाई का काम करते हैं जिससे उनको 5-6 हजार रू. मिल जाता है। पिंकु का कोई बैंक का खाता नहीं है। सोनाली के नाम से ही स्कूल का बैंक खाता है जिसमें200 रू. है। सोनाली की मां रूपाली बताती हैं कि दोबारा घर को बसाने में कम से कम तीन-चार साल लग जायेंगे। सफिदा के रिश्तेदार बताते हैं कि सफिदा परिवार सहित घर गई हुई है और उनका सभी समान जल कर खाक हो गया है।

हसीना शेख पत्नी सयरूल शेख अपनी जली हुई झुग्गी को साफ कर रहने लायक बनाने की कोशिश कर रही थी। वह बताती हैं कि उनके पति रिठाला क्षेत्र में सड़क से कबाड़ चुना करते थे अब उनका पैर टूट गया है। हसीना रोहणी तेरह सेक्टर में 5-6 घरों में सफाई का काम करती हैं। उनके दो बेटे हैं जिनकी शादी हो चुकी है वह भी परिवार के साथ यहीं रहते हैं और कूड़ा उठाने का काम करते हैं। उनके घर के कूलर, पंखा, मोबाईल, बर्तन सहित इक्ट्ठा किए हुए 15000 हजार रू. जल कर खाक हो गये। वह बताती हैं कि 1800 रू. किराया देना पड़ता है और 200 रू. बिजली का। उनको किराये लेने वाले का नाम पता नहीं है वह बताती हैं कि वे लोग आते हैं और किराया लेकर जाते हैं। वहीं पर खड़े दूसरे व्यक्ति ने बताया कि छह-सात अलग-अलग लोग हैं जो पूरे बस्ती से किराया वसुलते हैं। झुग्गी जलने के बाद किराया ले जाने वाला कोई व्यक्ति नहीं आया।

कबीर शेख सेक्टर सात में कूड़ा उठाते हैं परिवार के साथ इस बस्ती में रहते हैं। वह बताते हैं कि उनका 50-60 हजार का समान जल गया है। तीस हजार का दरवाजा गांव भेजने के लिये खरीद कर लाये थे वह भी जल गया। कबीर 5-6 माह के कूड़े इक्ट्ठा किये थे वह भी जल गया। कबीर चाहते हैं कि सरकार ऐसा करे कि हमसे कोई किराया नहीं लिया जाये।

बस्ती वालों का कहना है कि दमकल गाड़ी आग लगने के एक घंटे बाद आई जबकि दमकल केन्द्र यहां से बहुत नजदीक है 5-10 मिनट में दमकल की गाड़ी आ सकती थी। गाड़ी जिस रास्ते से आई वह रास्ता पहले से सीवर डालने के लिये खुदा था। अगर गाड़ी दूसरे रास्ते से आई होती तो झुग्गियां बच गई होती। दमकल गाड़ी देर से आने पर बस्ीत वालों ने अपना रोष जताया। उनका कहना है कि हमारा कई महीनों का कबाड़ इकट्ठा था पहले कबाड़ के रेट कम होने से नहीं बेच रहे थे, इधर नोट बंदी के कारण कबाड़ बेचने में परेशानी हो रही थी। हम किसी तरह अपना गुजारा करने के लिए परिवार के अन्य लोगों के दूसरे काम या छोटे-मोटे कबाड़ बेच कर गुजारा कर रहे थे। बस्ती वालों से किराया लेने वालों का नाम पूछने पर साफ मना करते हैं कि हम किराया लेने वाले का नाम नहीं बता सकते नहीं तो हमें मार-पीट कर भगा दिया जायेगा। अब लोगों को ठंड से बचने की चिंता सता रही है।

बस्ती में ही जिला मजिस्ट्रेट से मुलाकात हुई जब उनसे यह पूछा गया कि यह जमीन किसकी है तो जिला मजिस्ट्रेट का कहना है कि उन्हें जमीन के विषय में नहीं पता, अभी वह रिलिफ पर ध्यान दे रहे हैं। जबकि उनके साथ चल रहे एक अधिकारी ने दबी जुबान में प्राइवेट जमीन होने की बात कही। जिला मजिस्ट्रेट ने 280 झुग्गियां जलने की बात बताई जबकि लोगों का कहना है कि 600 के करीब झुग्गियां जली है। शाम सात बजे तक 10-12 टेंट ही लग पाये थे। जबकि वही बगल में पाखी की बहन अपने 5 साल के बच्चे को गोद में लेकर ठंड से बचाने की कोशिश कर रही थी।

बिना पारिश्रमिक लिये शहरों को स्वच्छ बनाने वाले लोगों की सुरक्षा कि जिम्मेदारी किसकी है? कौन बता सकता है कि यह जमीन किसकी है? कौन इन बस्ती वालों को सुरक्षा दे सकता है ताकि वह निर्भिक होकर बता सकें कि उनसे अवैध किराया वसूली करने वाला व्यक्ति कौन है? क्या उनको इस तरह की अवैध वसूली से कोई सिस्टम है जो छुटकारा दिला सके?

मेहतकश जनता केवल अपने आवास में ही नहीं कार्यस्थल पर भी सुरक्षित नहीं है। आवास में उसको जान-माल की क्षति होती है वहीं कार्यस्थल पर मुनाफाखोरों की जेब भरने के लिये उनको जान गंवानी पड़ती है। 10 नवम्बर को गाजियाबाद जिले के शहीद नगर में जैकेट बनाने वाली फैब्रिकेटर में 13 लोगों (अपुष्ट खबरों के अनुसार 17 लोग) की जलकर मौत हो गई। 12 नवम्बर को सिरसपुर में दो सगे भाईयों की कम्पनी में विस्फोट होने से जान चली गई। 12 नवम्बर को ही बसंत स्कावॅयर मॉल में सफाई कर्मचारी को सिवरेज सफाई करने के लिये उतार दिया गया जिसमें एक मजदूर की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया।

मेहनतकश आबादी जो कि शहर को बनाती है, चलाती है, स्वच्छ रखती है उसकी इस तरह की मौत के जिम्मेवार कौन है? सरकार दावा करती है कि वह गरीबों के लिये है तो आखिर इनकी हालात में कोई बदलाव क्यों नहीं आ पा रहा है? क्या यह वर्गीय समाज मेहनतकश आबादी को एक निर्भिक, साफ-सुथरी, जिन्दगी दे सकता है जिसमें उनके बच्चों का भविष्य उज्जवल हो? क्या इन बस्ती वालों को अवैध वसूली से बचाया जा सकता है?

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Wednesday, November 30, 2016

रेवाड़ा बास में मुसलमानों पर हुये हमले की जाँच रिपोर्ट

अलवर जिला का नौगांव थाना क्षेत्र के रघुनाथगढ़ ग्राम पंचायत में खरका बास, रेवाड़ा बास, खैराती बास, बड़ा बास, तैलिया बास, किला माद्री, हाजी बास जैसे 12 बास हैं। इन 12 बास में अरावली पर्वत की गोद में बसा एक रेवाड़ा का बास है जो रघुनाथगढ़ ग्राम पंचायत का अंतिम गांव है। इसके बाद जंगल और अरावली की पर्वत श्रृंखला शुरू होती है। यहां पर अरावली पर्वतमाला राजस्थान और हरियाणा को विभाजित करता है। यह गांव राजस्थान प्रदेश के हिस्से में है लेकिन हरियाणा का मेवात कल्चर यहां का अभिन्न अंग है। गैर अधिकारिक तौर पर आमजन इसे मेवात ईलाके का हिस्सा मानते हैं। 15-16 सितम्बर, 2016 को अचानक रघुनाथगढ़ ग्राम पंचायत सुर्खियों में आ गया। 15 सितम्बर को समाचार चैनलों में समाचार आने लगे कि रेवाड़ा बास के जंगलों में 36 गायों के अवशेष मिले हैं। 16 सितम्बर को यह खबर समाचार पत्रों की सुर्खियां बन गईं। इस खबर को पढ़-सुनकर हमारा एक तथ्य अन्वेषण दल रेवाड़ा बास पहुंचा।

रेवाड़ा बास में साठ-सत्तर घर हैं। जब यह टीम रेवाड़ा बास पहुंची तो गांव में सन्नाटे का माहौल था। लोगों के चेहरे पर उदासी और खौफ का मंजर साफ दिख रहा था। गांव में कच्चे-पक्के छोटे-छोटे घर हैं। पीने के पानी के साधन के रूप में नल, कुंआ, बोर (बोरिंग) हैं। गांव में दो कमरों का एक प्राइमरी स्कूल है जिसमें दो टीचर हैं। शिक्षा का स्तर निम्न है। रेवाड़ा बास में एक भी सरकारी नौकरी वाला व्यक्ति नहीं है। आजीविका के मुख्य साधन खेती, पशुपालन और मजदूरी हैं। गांव में ड्राइवर की नौकरी करने वाले लोग भी हैं। जब रेवाड़ा बास वासियों को पता चला कि जांच टीम आई हुई है तो वे लोग इधर-उधर से भाग कर जांच दल के करीब पहुंचने लगे। उन लोगों ने अपने ऊपर हुई जुल्म की कहानी सुनाना शुरू किया तो लगा कि आज भी हम किसी लोकतांत्रिक देश के वासी नहीं हैं। उनकी कहानी सुन कर लगा कि भारत का जो कानून कहता है, ठीक उससे उल्ट हो रहा है। कानून यह कहता है कि सौ दोषी छूट जायें लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये, लेकिन ठीक उससे उल्ट एक-दो दोषियों को बचाने के लिए पूरे गांव के ऊपर जुल्म किया गया। इस गांव वालों पर हुये जुल्म को देखकर ऐसा लगता है कि भारत में शासन-प्रशासन नाम की कोई चीज नहीं है। भारत किसी संविधान या कानून की तहत नहीं, कुछ लोगों एवं दलों के हुक्म से चल रहा है।

हमारे देश में अलग-अलग धर्मों के अलग-अलग त्यौहार होता है। अपने धर्म और मान्यताओं के अनुसार हम अपना त्यौहार मनाते हैं। इस्लाम में ईद और बकरीद बड़ा त्यौहार होता है जिस दिन भारत सरकार औपचारिक रूप से छुट्टी रखती है। इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिये इन त्यौहारों का बेसब्री से इंतजार होता है। नये-नये कपड़े, सेवईयां, गोश्त इन त्यौहारों की पहचान होती है। रेवाड़ा बास में भी इस बकरीद की खुशी थी। लोग एक दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे। बच्चे ईद की खुशीयां में मस्त थे, पूरे दिन गांव में चहल-पहल थी। खुशियां दूसरे दिन भी चल रही थी। बहन बेटियां अपने परिवार से मिलने आई हुई थीं, नाते-रिश्तेदार भी इस खुशी में शरीक हो रहे थे। लेकिन उसी दिन 14 सितम्बर, 2016 की रात को गाय काटने वालों की तलाशी के नाम पर आस-पास के कई गांवों में दबीश दी गई और 12 लोगों को गाय काटने के इल्जाम में गिरफ्तार कर 19 सितम्बर तक पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया, जो अब जेल में हैं। गिरफ्तार व्यक्तियों में नूरा उर्फ नेर मोहम्मद (पूर्व सरपंच) पुत्र भोंदू, निवासी खड़का बास, शौकत पुत्र अयूब, हकमुद्दीन पुत्र नसीब, खुर्शीद पुत्र ममरेज और इरफान पुत्र नसीब निवासी सभी खैराती बास, जावेद पुत्र याकूब और राशिद पुत्र याकूब निवासी बड़ा बास, फकरूद्दीन पुत्र मम्मन निवासी तैलिया बास, आमीन पुत्र फजरू, निवासी रघुनाथगढ़, साजिद पुत्र मजीद, शीतल का बास, अल्ताफ पुत्र आजाद एवं शौकीन पुत्र इलियास, निवासी पाट खोरी, हरियाणा के रहने वाले हैं। गांव वालों का कहना है कि नूरा उर्फ नेर मोहम्मद (60 साल) को 15 तारीख को सुबह 4 बजे उनके घर से पुलिस लेकर गई। साजिद (24 साल) अपनी पत्नी को लेने आया हुआ था, गिरफ्तार व्यक्तियों में बड़ा बास का 16 साल का विक्लांग लड़का भी है। कुछ लोग दूसरे जगह से बकरीद की मुबारकबाद देने रिश्तेदारों के पास आये थे तो पुलिस ने रात में सोते वक्त उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस ने दूसरे दिन 15 सितम्बर को क्यूआरटी उपाधीक्षक परमाल सिंह गुर्जर के नेतृत्व में 150 अधिकारी व जवानों के साथ रेवाड़ा बास में दबिश दी। गांव वालों ने बताया कि पुलिस जवानों के साथ विधायक ज्ञानदेव आहूजा (यह वही विधायक है जिन्होंने जे एन यू आंदोलन के समय कंडोम और बड़ी, छोटी हड्डियों की संख्या बताई थी ) के साथ शिवसेना और हिन्दू संगठन के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता 200-250 की संख्या में रेवाड़ा बास पहुंचे। विधायक ज्ञानदेव आहूजा के स्पष्टीकरण से भी यह बात प्रमाणित होता है कि गांव में शिव सेना, हिन्दू संगठन के कार्यकर्ता पहुंचे थे। लोगों ने बताया कि आहूजा के साथ आये लोगो ने घरों में तोड़-फोड़ की। उन्होंने यह भी बताया कि ज्ञानदेव आहूजा के साथ आये लोग पीले गमछे गले मे डाले हुये थे। कुछ के हाथ में सरिया, डंडे और हथियार भी थे। उन लोगों ने पुलिस वालों के साथ मिलकर घरों में तोड़-फोड़ और लूट-पाट की। गांव की महिलाओं ने बताया कि ये पीले गमछे बांधे हुए लोग कह रहे थे कि गांव वालों के घरो को आग लगा दो, कोई भी बचने नहीं पाये।

जांच टीम ने पाया कि रेवाड़ा बास के सभी घरों में तोड़-फोड़ की गई है। घरों में जो भी सामान थे उसको नुकसान पहुंचाया गया है। यहां तक कि घरों के दरवाजे, खड़िया, चरपाई को तोड़ दिये गये हैं जिस चरपाई को नहीं तोड़ पाये हैं उनके रस्सी को काट दिया गया है। अनाज रखने वाले ट्रंक को कुल्हाड़ी या नुकीली चीजों से नुकसान पहुंचाया गया है। फ्रिज, पंखे, अलमारी, टीवी को तोड़ डाला गया है। खाने व पीने के बर्तन तोड़ दिये गए। यहां तक कि पशुओं की चारा काटने वाली मशीन को भी तोड़ दिया गया है, बोरवेल को तोड़ कर उसके अंदर ईंट पत्थर भर दिया गया है, अनाजों को मिक्स कर दिया गया है। जिन घरों में नई शादी हुई है उन घरों के समान को और ज्यादा तितर-बितर कर तलाशी ली गई है। गांव में करीब 4 घन्टे तक उत्पात मचाया गया है। कई लोगों ने बताया कि उनके घरों में रखे हुए जेवर और नकदी को लूट लिया गया। हमलावर अपने साथ पांच दुपहिया वाहन और अनीस नामक व्यक्ति का एक मिनी ट्रक भी उठाकर ले गई। जो लोग अपने मकानों पर ताला लगाकर भाग गए थे, इन हमलावरों ने वह ताले तोड़ दिये और जहां ताले तोड़ने में नाकाम रहे वहां दरवाजों को तोड़कर कमरे के अंदर घुस गये। हमलावरों ने गांव वालों के जानवर खोल दिये और दो बकरियों को मार दिया। यहां तक कि विक्लांग अफसाना (18 साल) जो कि भाग नहीं सकती थी, चरपाई पर लेटी हुई थी उसे पुलिस वालों ने सिर्फ इसलिए मारा और मुंह में डंडा दे दिया कि वह डर कर भागी क्यों नहीं।

गांव की सरहद पर पहला मकान उस्मान नाम के व्यक्ति का है। उस्मान की पत्नी शरीफन ने बताया कि उनके पति पलवल के पास रहकर मजदूरी करते हैं, आज ही बाहर से आये हुये हैं। उनकी दो बेटे और सात बेटियां हैं। शरीफन घर के आंगन में ही किराने की एक छोटी सी दुकान चला कर गुजारा करती हैं। शरीफन बताती हैं कि ‘‘रात में पुलिस ने आकर तोड़-फोड़ की फिर दूसरे दिन मुंछन वाली आये और पब्लिक आई- कहने लगी आग लगा दियो। वह बताती हैं कि पांच लाख का नुकसान हुआ है- आठ तोला सोना, दो किलो चांदी और दो भैंस खोल कर छोड़ दिये अभी तक मिली नहीं हैं दुकान में रखी चीजों को तोड़ दिया, घर का फ्रीज और समान तोड़ दिये। बोर को तोड़ दिया और पत्थर डाल दिया। बोर से खेती-बाड़ी, पशु के लिये पानी, पीने का पानी होता था। बोर लगाने में दो लाख रू. लग जाते हैं।’’

जैसे-जैसे हमारी जांच टीम गांव में आगे बढ़ रही थी तबाही का खौफनाक मन्जर हमें देखने को मिल रहा था। हर घर में तोड़-फोड़ के बाद बिखरा हुआ सामान अपनी कहानी खुद बयॉं कर रहा था।

गांव के युसुफ खेती का काम करते हैं, उनके पास 10-12 बीघा खेती की जमीन है। युसुफ ने बताया कि ‘‘12-1 बजे का समय था....... बजरंग दल वाले, शिव सेना वाले आये। उनके साथ कोबरा (काली वर्दी में पुलिस वाले को कोबरा वाले बता रहे थे) वाले थे और रामगढ़ का हमारा एमएलए साहब ज्ञानदेव आहूजा थे। मुबारिकपुर और नौगांवा से भी हिन्दू लोग आये- बोलेरो, शिफ्ट गाड़ी में 500-600 लोग आये। हम दूर से खड़े होकर देख रहे थे। पीली वर्दी पहने पांच बस से आये, हम यहां आते तो हमको भी मार देते। बकरियों को लाठी से मार रहे थे जिससे कई बकरियां मर गईं। पशुओं को रखने वाले था उसको गिरा दिया। अनाज तक नहीं छोड़ा, अनाज भी ले गया। कई घरों में खाना तक नहीं बना।’’

मोहम्मद इस्लाम के मकान में भीड़ ने सभी चारपाईयों को निशाना बनाया। घर में रखे खाने के बर्तन, चुल्हे और मटके फोड़ दिये गए कमरे में सालभर खाने के लिये रखे गए गेंहू की कोठियों पर कुल्हाड़ी से कई वार किये गए जिसके निशान हमारी जांच टीम ने देखे। इस्लाम की पत्नी जमीला के दो लड़के और एक लड़की हैं। एक हसली (गले का जेवर) दो तोला के, दुना (गले का जेवर) एक तोला के लेकर गये। जमीला बताती हैं कि ‘‘वह अब बाहर ही रहती हैं, डर से कि कोई मारने आ सकता है....... किसी के आने पर ही घर को आती है।’’

हारून उम्र 36 साल, गांव में खेती करते हैं। वह बताते हैं कि ‘‘गांव के सारे लोग किसान हैं, एक भी सरकारी नौकरी में नहीं है। जिसका नुकसान हुआ है, नजायज है। उस दिन के बाद पुलिस गांव में नहीं आई है। इस बास से किसी को गिरफ्तार नहीं किया है, अलग-अलग बास से गिरफ्तारी हुई है।

जुबेर, गफ्फार, व लियाकत तीनों भाई हैं। गांव के सबसे अंतिम छोर पर इनका घर हैं। जुबेर की पत्नी हसीना बताती हैं कि ‘‘जब दिन में पुलिस वाले आये तो वह खेत में बाजरा काट रही थी। घर पर उनकी बूढ़ी सास थी। पुलिस देखकर वह भागने लगी, कुछ दूर भागने के बाद वह खेत में गिर गई। वह बताती है कि घर के उनके दरवाजे, खुटी, बिजली के बोर्ड, सब तोड़ दिये। उनके घर के बर्तन भी तोड़ गये।’’ घर के ट्रंक को नुकीली वस्तु से छेद कर दिये थे जिसमें वह पुराने कपड़ा लगा-लगा कर अनाज को रखी थी। घर के मशीन, दरवाजे सब टूटे पड़े थे। यहां तक कि उनके पानी रखने के लिये जो घर से बाहर सीमेंट का बनाया हुआ था वह भी तोड़ दिये थे। पशुओं का चारा काटने वाली मशीन को भी तोड़ दिये। उनके घर के सामने का बरामदे टूट कर गिर गया था उनसे पूछने पर कि यह भी पुलिस वालों ने तोड़ा है तो उनका कहना था कि यह अपने-आप पहले ही गिर चुका है। वह घर के अन्दर ले जाकर सब समान दिखा रही थी और बता रही थी कि बच्चों को सोने के लिये खाट भी नहीं है, वह मांग कर खाट लाई है। एक मोटरसाईकिल, आठ तोला सोना और जुबेर का 15 हजार रू., गफ्फार का बीस हजार रू. और लियाकत के दस हजार रू. लेकर गये। लियाकत ने प्याज की खेती करने के लिये 35 हजार रू. ब्याज पर लिया था, जिसमें से 25 हजार रू. खेती में खर्च हो चुका था और दस हजार रू. बचा था। जुबेर ने भैंस बेचकर 15 हजार रू. तथा गफ्फार ट्रक चलाते है तो बकरीद के लिए बीस हजार रू. जो घर में रखा था, उसको पुलिस ले गई।

खालिद की पत्नी तस्लीमा ने हमारी जांच टीम को बताया कि वह हमलावरों के आने पर भागने में नाकाम रही पुलिस और उन्मादी ‘गौ रक्षकों’ ने उसे गन्दी-गन्दी गालियां दी, विरोध करने पर पुलिस ने उसे थप्पड़ मारे। हमलावरों खालिद की मोटर साईकिल को भी अपने साथ ले गये। इसी तरह की कहानी उस्मान की पत्नी बातुनी, शाऊन की पत्नी मुबीना, असीम की पत्नी जुबेदा ने सुनाई। आरिफ की पत्नी साजिदा तोड़-फोड़ के मामले में थोड़ी खुशकिस्मत रही। हमलावरां ने इनके घर में प्रवेश तो किया लेकिन वो सिर्फ जेवर व नकदी लेकर चले गये। घर में मौजूद किसी भी सामान को नहीं तोड़ा। साजिदा हमारी टीम को उसके भाई अली मोहम्मद उर्फ आली के मकान पर ले गई। आली अपनी पत्नी सहित इस हमले के बाद से गांव छोड चुके हैं। साजिदा ने बताया कि उसके भाई की पत्नी ने आठ दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था,उस आठ दिन की मासूम जान और अपनी कमजोर पत्नी के साथ आली ताला लगाकर दूसरे गांव चले गये। हमारी जांच टीम ने खिड़की से जब उसके मकान में देखा तो उसका सारा सामान टूटी हुई हालत में पड़ा था। साजिदा ने बताया कि आली की पत्नी के जेवर भी हमलावरों ने लूट लिया। शमीम और सलीम दोनों अनाथ भाईयों की कुछ समय पूर्व ही शादी हुई थी। उन्मादी हमलावरों ने दोनों भाईयों के घरों को भी अपने गुस्से का निशाना बनाया। शादी में मिला नया गृहस्थी का सामान बुरी तरह से तोड़ दिया गया, जिसमें फ्रिज, आलमारी, पलंग, बर्तन इत्यादि टूटी हुई अवस्था में देखे गए। नई दुल्हन के जेवर भी ब्रिफकेस तोड़कर हमलावर ले गये। गांव के ही अनीस, जो पेशे से ड्राईवर हैं ने हमारी जांच टीम को बताया कि बकरीद होने की वजह से वह अपने मालिक का मिनी ट्रक टाटा 1109 गांव में ही ले आया था। भीड़ ने ट्रक के कांच तोड़कर ट्रक में प्रवेश किया और वह ट्रक को अपने साथ ले गई। हालांकी ट्रक मिल गया है, और पुलिस चैकी में खड़ा है।

उस्मान की पत्नी बातुनी बताती हैं कि जब घर का दरवाजा नहीं खुला तो कुल्हाड़ी से दरवाजा ही तोड़ दिया और 15000 रू. और दो तोला सोना व डेढ़ किलो चांदी ले गए। मुबीना का कच्चा घर है तो दीवार ही गिरा दिये और 20,000 रू. ले गये। उनके शौहर शाहिद बाहर भागे हुये हैं। लली शमीम की शादी को पांच महीने ही हुये थे, उनकी शादी का मिला सारा सामान तोड़ दिया। सामानों में कुल्हाड़ी से ऐसे वार किये गये कि सभी के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उनकी बाईक भी उठा ले गए। जुबैदा का शौहर नहीं है। वे मध्याहन भोजन बनाकर अपना गुजारा करती हैं। उनके घर को तो तोड़ा ही, पैसा व जेवर न मिलने पर उसके बर्तन को भी तोड़ दिया।

शबनम को बोला कि तुम गोश्त खाती हो तेरा आदमी कहां है। उसे थप्पड़ मारा तो वह भागी तो उसे खींच लिया और गन्दी-गालियां देनी शुरू कर दी। उसका डेढ़ किलो चांदी व एक तौला सोना लूट कर ले गए। तीन साल के बच्चे फैजान को मारा, उसकी पीठ पर अभी तक घाव के निशान नहीं गए और मन से दहशत भी नहीं गई। हसीना, जिसके 15 दिन का बच्चा था, बहुत विनती की, मुझे छोड़ दो, मेरा शरीर का बच्चा है। फिर भी उसे मारा और घर में रखे 25000 रू. भी ले गये। इस गांव के सभी लोगों की यही कहानी बन चुकी है। लोगों के घर खाना बनाने के लिए बर्तन नहीं है, अनाज नहीं है। सभी लोग शाम होते ही जंगल चले जाते हैं, कुछ लकड़ियां इक्ट्ठा कर वहीं पर कुछ खा-पका लेते हैं और दहशत में सारी रात बिताते हैं।

याद मुहम्मद की उम्र 53 साल है। उनके तीन लड़के ट्रक चलाते हैं और वह खेती करते हैं। उनकी बेटी राहील बकरीद मनाने के लिये आई हुई थी, जिसकी शादी बंदोली में हुई है। उसके दो तोला सोना की हसली ले गये और याद मुहम्मद के घर से डेढ़ किलो चांदी लेकर गये। उनके घर की बर्तन, चरपाई को तोड़ दिया था। वह बताते हैं कि 14 की रात में पुलिस आई थी तो महिलाओं के साथ मार-पीट की जिससे वह भी डर कर भाग गई थी। याद मुहम्मद बताते हैं कि उनका राशन कार्ड भी लेकर चले गये।

17 सितम्बर को शिवसेना, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल और भाजपा ने मुबारिकपुर में बंद कराया था जिससे बजार, दुकान बंद रहे तथा मुबारिकपुर में जुमे का नमाज तक अदा नहीं किया गया।

गांव वालों का कहना है कि :

Ø पुलिस की मिलीभगत से दो व्यक्ति- दीनदार उर्फ लंगडा निवासी रेवाड़ा बास और खुर्शीद उर्फ मुल्ला, निवासी बाघौरा थाना किशनगढ़ पुलिस की मिलीभगत से काफी समय से गाय, बछड़े, कटरा काट कर व्यापार करते थे। इसके लिए वे निजामुद्दीन और सुल्तान सिंह नाम के पुलिस वालों को बीस हजार रू. प्रति माह देते थे।

Ø पुलिस को जब गऊकशी की खबर मिली और वह छापेमारी की तैयारी कर रही थी तो यही पुलिस वालों ने फोन कर इन कसाईयों (दीनदार उर्फ लंगडा और खुर्शीद) को भगा दिया।

Ø पकड़े गये सभी लोग निर्दोष हैं, एक भी दोषी को नहीं पकड़ा गया, जब कि पुलिस वाले सही व्यक्ति को जानते हैं।

Ø रेवाडा बास के घरों में खाने-पीने का बर्तन नहीं हैं, घर के सभी सामान तोड़-फोड़ दिये गये हैं और नकदी व जेवरात लूट लिये गये हैं।

गांव वालों की मांग :

Ø बेकसूर लोगों को रिहा किया जाये।

Ø दोषियों को पकड़ा जाये।

Ø लोगों के हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाये।

पुलिस का बयान :

नौगावां थाना प्रभारी शिवराम गुर्जर ने बताया कि रेवाड़ा बास में गऊकशी की सूचना बुधवार (14 सितम्बर) को रात ग्यारह बजे मिली। पुलिस दल मौके पर पहुंची तो गऊकशी का कुछ अवशेष मिला। इस पर उच्च अधिकारियों को सूचना देकर जेसीबी से खुदाई कराई गई, जिसमें 36 अवशेष मिले। पुलिस ने मौके से दस लोगों को गिरफ्तार कर 6 गोवंश को मुक्त कराया। मौके से चाकू, तराजू व बाट, केंटरा गाड़ी और चार बाईक भी बरामद किया गया।

विधायक ज्ञान देव आहूजा का बयान :

गुरूवार (15 सितम्बर) को घटना स्थल पर गए सभी कार्यकर्ता अनुशासनिक तरीके से वापस आये। कार्यकर्ता व प्रशासन ने किसी भी घर में कोई तोड़-फोड़ नहीं की। पूर्व जिला प्रमुख खान के समर्थकों ने ही घरों में तोड़-फोड़ कर माहौल खराब करने का प्रयास किया है। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को घटना से अवगत करा दिया गया है।

निष्कर्ष :

Ø रघुनाथगढ़ ग्राम पंचायत मुस्लिम बहुल है।

Ø यह कार्रवाई एक विशेष समुदाय को भयभीत करने के लिये की गई है।

Ø स्थानीय पुलिस की जानकारी में बीफ का कारोबार हो रहा था। जिसके लिये पुलिस को हर माह पैसा दिया जाता था।

Ø आपसी रंजिश के कारण बकरीद में गऊकशी की जानकारी शिवसेना, विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल जैसे संगठनों को पहुंचाई गई।

Ø स्थानीय पुलिस ने उच्च अधिकारियों के दबाव में बेकसूर लोगों को पकड़कर अपने को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की।

Ø घरों में लूट-पाट, तोड़-फोड़ का मकसद लोगों को अधिक से अधिक आर्थिक नुकसान पहुंचा कर उनके मन में भय पैदा करना और उनको पिछड़े बनाये रखना है, जो कि हमेशा एक विशेष सम्प्रदाय और जाति के लोगों के साथ किया जाता रहा है।

Ø घरो में तोड़-फोड़ पुलिस और शिवसेना, बजरंग दल व भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा विधायक ज्ञानदेव आहूजा की मौजूदगी में की गई।

Ø इस घटना से विरोधियों के मन में भय का माहौल पैदा हुआ है।

Ø रेवाड़ा बास में लूट-पाट, तोड़-फोड़ की कार्रवाई से लोगों की माली हालत कई साल पीछे चली गई है।

Ø रेहड़ा बास से गऊकशी की जगह करीब 4 कि.मी. दूर है। रास्ते मे रेत नाले हैं जहां बाईक जा नहीं सकती। पुलिस ने वहां से बाईक कैसे बरामद की? निश्चय ही 15 सितम्बर को यह बाईक गांव से उठाई गई है, जिसका लोगों ने अपनी बातों में जिक्र किया है।

Ø घटना स्थल इतना वीरान है कि पुलिस को वहां जाने के लिये पैदल दो से तीन किलोमीटर चलना पड़ेगा। अगर पुलिस इतनी दूर पैदल चलकर रात में वहां पहुंचती है तो लोग पुलिस को देखकर रूके रहेंगे? पुलिस ने दस लोगों को मौके से कैसे गिरफ्तार कर लिया?





मांगे :

Ø पूरे मामले की न्यायिक जांच कराई जाये।

Ø लोगों को हुए नुकसान का मुआवजा राज्य सरकार द्वारा दिया जाये।

Ø रघुनाथगढ़ ग्राम पंचायत के लोगों की जान-माल की सुरक्षा की जाये।

Ø दोषियों को पकड़ा जाये और गिरफ्तार बेकसूर लोगों पर लगाये गये मुकदमें वापस लिये जायें।

Ø लूट-पाट व तोड़-फोड़ में शामिल लोगों व पुलिस के जवानों, अधिकारियों पर केस दर्ज कराये जायें।

Ø विधायक ज्ञानदेव आहूजा की भूमिका की जांच की जाये।

Ø पैसा लेकर बीफ का कारोबार कराने वाले पुलिसकर्मियोंध्अधिकारियों को गिरफ्तार किया जाये।

सुझाव :

Ø साम्प्रदायिक माहौल को ठीक करने के लिये सद्भावना बैठकें कराई जायें।

Ø लोगों के मन से खौफ निकालने के लिये दोषियों पर कार्रवाई की जाये।

Ø लोगों को कानून के प्रति जागरूक किया जाये।

Ø गोरक्षा के नाम पर मुस्लिमों, दलितों पर हमला करने वाले संगठनों पर उचित कार्रवाई की जाये।

Ø न्यायपालिका व मानवाधिकार आयोग को खुद संज्ञान में इस मामले को लेना चाहिये।

Ø साम्प्रदायिक माहौल फैलाने वाले शक्तियों को अलग-थलग करना चाहिये।



जांच टीम के सदस्य :

अन्सार इन्दौरी, मोहम्मद तल्हा (एन.सी.एच.आर. ओ) सुनील कुमार (स्वतंत्र लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता), अशोक कुमारी (शोद्दार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय),



छत्तीसगढ़ के आदिवासी जनता पर बढ़ता राजकीय दमन

सुनील कुमार
भारत अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और इसी वर्ष भारत ने अपना 67 वां गणतंत्र दिवस मनाया। लोकतंत्र-गणतंत्र पर नेता, मंत्री, अधिकारी बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जो सुनने में बहुत अच्छी लगती है और हमें गर्व महसूस होता है कि हम लोकतांत्रिक देश में जी रहे हैं। यह गर्व और खुशफहमी तभी तक रहती है जब तक हम अपनी स्वतंत्रता और संविधान में दिये हुये अधिकार की बात न करें। 67 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि ‘‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है।’’ राष्ट्रपति की यह बात क्या भारत जैसे ‘लोकतांत्रिक’, ‘गणतांत्रिक’ देश में लागू होती है? भारत का संविधान अधिकार यहां के प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद से विचारधारा, धर्म, भारत में रहने का जगह, व्यवसाय को चुन सकता है। क्या भारतीय संविधान लागू होने के 67 साल बाद भी यह अधिकार भारत की आम जनता को मिला है? यह हम सभी के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है। आज भी दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, आदिवासियों, पर हमले हो रहे हैं। दलितों के आज भी हाथ-पैर काटे जा रहे हैं, रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्र को आत्महत्या करने की स्थिति में पहुंचा दिया जाता है। होनहार अल्पसंख्यक नौजवान को आतंकवाद के नाम पर पकड़ कर जेलों में डाल दिया जा रहा है। महिलाओं, यहां तक कि छोटी-छोटी बच्चियों को रोजाना बलात्कार का शिकार होना पड़ रहा है। आईएएस, पीसीएस महिलाओं को भी मंत्रियों और सीनियर के हाथों खुलेआम शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है। उन्हें उनके ईशारों पर चलना होता है और ऐसा नहीं होने पर उनको ट्रांसफर से लेकर कई तरह की जिल्लत झेलने पड़ती हैं। इस तरह की खबरें शहरी क्षेत्र में होने के कारण थोड़ी-बहुत मीडिया या सोशल मीडिया में आ जाती हंै।

इस देश के मूलवासी आदिवासी को छत्तीसगढ़ सरकार और भारत सरकार लाखों की संख्या में अर्द्धसैनिक बल भेजकर प्रतिदिन मरवा रही है। उनकी बहु-बेटियों के साथ बलात्कार तो आम बात हो गई है। अर्द्धसैनिक बलों द्वारा उनके घरों के मुर्गे, बकरे, आनाज, खाना और पैसे-गहने लूट कर ले जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यह सब करने के बाद उनको पुरस्कृत भी किया जाता है, जैसे सोनी सोढी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अंकित गर्ग को 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। छत्त्ीासगढ़ में आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की खबरें शायद ही कभी समाचार पत्रों में छपती हैं। थोड़ी-बहुत खबर तब बनती है जब समाज के प्रहरी मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार उस ईलाके में जाकर कुछ खोज-बीन कर पाते हैं। लेकिन यह खबर मीडिया के टीआरपी बढ़ाने के लिये नहीं होती है इसलिए उसे प्रमुखता नहीं दी जाती है। राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर तब आती है जब 28 जून, 2012 की रात बीजापुर के सरकिनागुड़ा जैसी घटना होती है जिसमें 17 ग्रामीणों को (इसमें 6 बच्चे थे) मौत की नींद सुला दी जाती है। इस खबर पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती है कि बहादुर जवानों को बड़ी सफलता मिली है। ऐसी ही कुछ घटनाएं हाल के दिनों में लगातार हो रही है जो कुछ समाचार पत्रों और मीडिया मंे आ पायी हैं। लेकिन इस तरह की खबरें भी आम जनता तक पहुंच नहीं पातीं।

30 अक्टूबर, 2015 को रष्ट्रीय स्तर की महिलाओं का एक दल जगदलपरु और बीजापुर गया था। इस दल को पता चला कि 19/20 से 24 अक्टूबर, 2015 के बीच बासागुडा थाना अन्तर्गत चिन्न गेल्लूर, पेदा गेल्लूर, गंुडुम और बुड़गी चेरू गांव में सुरक्षा बलों ने जाकर गांव की महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और मारपीट की। पेदा गेल्लूर और चिन्ना गेल्लूर गांव में ही कम से कम 15 औरतें मिलीं, जिनके साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं। इनमें से 4 महिलायें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कर्राइं। इन महिलाओं में एक 14 साल की बच्ची तथा एक गर्भवती महिला थीं, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। गर्भवती महिला के साथ नदी में ले जाकर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। महिलाओं के स्तनों को निचोड़ा गया, उनके कपड़े फाड़ दिये गये। जांच दल की टीम ने कई महिलाओं पर चोट के निशान देखे, कई महिलाएं ठीक से चल नहीं पा रही थीं। मारपीट, बलात्कार के अलावा इनके घरों के रुपये-पैसों को लूटा गया, उनके चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिए गये और जो बचा वह साथ में ले गये। घरों में तोड़-फोड़ किया गया और उनके टाॅर्च, चादर, कपड़े भी लूटे गये। यह टीम समय की कमी के कारण सभी गांवों में नहीं जा पाई थी। इन महिलाओं के बयान दर्ज कराने के बावजूद अभी तक किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस बीच में काफी फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार की घटनाएं हुईं। 15 जनवरी, 2106 को सीडीआरओ (मानवाधिकार संगठनों का समूह) और डब्ल्यूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) की टीम छत्तीसगढ़ गई थी। इस टीम का अनुभव भी अक्टूबर में गई टीम जैसा ही था। 11 जनवरी, 2016 को सुकमा जिले के कुकानार थाना के अन्तर्गत ग्राम कुन्ना गांव के पहाड़ियों पर ज्वांइट फोर्स (सी.आर.पी.एफ., कोबरा, डीआरजी, एसपीओ) के हजारों जवानों (लोकल भाषा में बाजार भर) ने डेरा डाल रखा था। कुन्ना गांव में पेद्दापारा, कोर्मा गोंदी, खास पारा जैसे दर्जन भर पारा (मोहल्ला) हैं। यह गांव मुख्य सड़क से करीब 15-17 कि.मी. अन्दर है और गांव के लोगों को सड़क तक पहुंचने के लिए 3 घंटे लगते हैं। 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बलों, एसपीओ और जिला रिजर्व फोर्स के जवानों ने गांव को घेर लिया। पेद्दापार के ऊंगा खेती करते हैं और आंध्रा जाकर ड्राइवर का काम भी करते हैं। फोर्स ने उनके घर का दरवाजा तोड़ दिया, घर में रखे 500 रुपये ले लिये और 10 किलो चावल, 5 किलो दाल और 5 मुर्गे खा लिये। उनकी पत्नी सुकुरी मुसकी के अन्डर गारमेंट जला दिये और उनके घर के दिवाल पर यह लिख दिये -‘‘फोन कर 9589117299 आप का बलाई सतडे कर।’’ ऊंगा का आधार कार्ड भी फोर्स वाले लेकर चले गये। इसी तरह गांव के अन्य घरों में तोड़-फोड़ की। चावल, दाल, सब्जी, मुर्गे, बकरी खाये और मरक्का पोडियामी के घर में लगे केले के पेड़ से केले काट कर ले गये। मुचाकी कोसी, करताम हड़मे, करतामी गंगी, हड़मी पेडियामी, कारतामी कोसी, पोडियामी जोगी व हिड़मे भड़कामी सहित कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार व लैंगिक हिंसा किया। महिलाओं ने सोनी सोढी के नेतृत्व में बस्तर संभाग के कमिश्नर के पास शिकायत की। इन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उनके स्तन को निचोड़ा गया। कुंआरी लड़कियां अपने बहनों के मंगलसूत पहन कर अपने को विवाहित बतायी, क्योंकि गांव में 17-18 साल की लड़की अगर शादी-शुदा नहीं है तो उसको माओवादी मान लिया जाता है। इस गांव के 29 लोगों (24 पुरुष, 5 महिला) को पकड़ कर पुलिस ले गई, जिनमें से तीन पर फर्जी केस लगा कर जेल भेज दिया गया। गांव वालों को ले जाते समय रास्ते में बुरी तरह मारा-पीटा गया, महिलाओं के कपड़े फाड़े गये।

कोर्मा गोंदी में 13 जनवरी, 2016 को यही सुरक्षा बल गये और अन्दावेटी का मोबाईल फोन और 500 रुपये छीन लिये। इसी तरह गांव के अन्य लोगों के साथ मारपीट किये और खाद्य सामग्री सहित मुर्गे खा गये। इसी गांव के लालू सोडी (21), पुत्र सोडी लक्कमा को पुलिस ने पकड़ा और बुरी तरह पीटा। इस पिटाई से उसकी 14 जनवरी को मृत्यु हो गई, जिसका एफआईआर दर्ज नहीं हुआ। इसी पारा के योगा सोरी, पुत्र सोरी लक्का को फोर्स के तीन लोगों ने सुबह 9 बजे घर से खींच लिया और उसे गांव से एक किलोमीटर दूर ले जाकर मारा। उसके पैरों में काफी चोट आई, जिससे वह दो दिन तक चल नहीं पाया। इसी पारा के इरम्मा, देवाश्रम और सोमा को 12 जनवरी को पकड़ कर कुकानार थाने ले गये और पांच-पांच पुलिस वालों ने उनके साथ रास्ते में मारपीट की। 15 तारीख को सादे कागज पर हस्ताक्षर लेकर उनको छोड़ दिया गया।

पेद्दापारा से कुछ दूर गोटेकदम गांव के योगिरापारा में फोर्स गई और उसने फायरिंग करना शुरू की। उस समय लोग बांध निर्माण का कार्य कर रहे थे, जो मनरेगा द्वारा 9 लाख रुपये में बन रहा है। फोर्स की फायरिंग की आवाज सुनकर लोग काम छोड़ कर भाग गये। फोर्स ने घरों में घुसकर तलाशी लेनी शुरू की और महिलाओं के साथ छेड़खानी की। घरों में तलाशी के दौरान अरूमा के घर पर एक जवान बोरे (जिसमें समान रखा था) पर लात मार रहा था तो वह फिसल कर गिर गया। उसकी अपनी बंदूक से गोली चल गई जो उसके पैर में लगी और वह घायल हो गया। भीमा की मोटर बाईक से घायल जवान को ईलाज के लिए दो जवान लेकर गये और उसको बाईक वापस नहीं किये। अखबार में सुबह छपा कि माओवादी-पुलिस मुठभेड़ में एक जवान घायल हो गया। पुलिस 14 तारीख तक गांव में रही और तब तक गांव के पुरुष जंगल में भूखे-प्यासे छिपे रहे।

बीजापुर के बासागुडा थाना अन्तर्गत बेलम नेन्द्रा व गोटुम पारा में 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बल के ज्वांइट फोर्स गांव में तीन दिन तक रूकी रही। इन तीन दिनों में वे गांव के मुर्गे, बकरे को बनाये, खाये या और दारू भी पिये। कराआईती के घर में 7 जगहों पर खाना बनाये और दारू पिये। कराआईती के घर के 40 मुर्गे, 105 कि.ग्रा. चावल, 2 किलो मूंग दाल, बरबटी खाये और दो टीन तेल (एक टीन कोईना का और एक सरसों का) खत्म कर दिये। घर में रखे 10 हजार रू. भी ले गये। कराआईती के घर में खाने के साथ दारू भी पिये, जिसके बोतल आस-पास पड़े हुये थे।

मारवी योगा के घर के 14 मुर्गे, 10 किलो चावल, मूंग दाल, सब्जी और टमाटर खा गये, जिन्हंे वे शनिवार को बाजार से लाये थे। वे अपने साथ बड़े भाई की बेटी को रखते हैं जिसको फोर्स वाले ने गोंडी में कहा कि सभी औरतंे एक साथ रहो, रात में बतायेंगे। यहां तक कि एक घर से काॅपी और पेन भी ले गये। गांव में रूकने के दौरान दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौनिक शोषण किये। इससे पहले भी 6 जनवरी को सुरक्षा बलों के जवान गये थे। तब उन्होंने मरकमनन्दे को पीटा था, उसकी बकरी ले गये थे और लैंगिक इस हिंसा भी की थी। इस गांव को सलवा जुडूम के समय दो बार जला दिया गया था।

जब ये पीड़ित महिलाएं बीजापुर आयीं तो पुलिस अधीक्षक इनकी शिकायत लेने को तैयार नहीं थे। इनको थाने के अंदर डराया-धमकाया गया। दो-तीन दिन बाद देश भर से जब एसपी-डीएम को फोन गया तो इनकी शिकायत सुनी गई।

राष्ट्रपति की यह बात कि ‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है’, आम आदमी पर तो लागू नहीं होती है। हां, यह बात जज साहब जैसे लोगों के लिए जरूर है जिनके लिये बकरी पर भी केस दर्ज हो जाता है। राष्ट्रपति इसी सम्बोधन में आगे कहते हैं कि ‘हमारे बीच सन्देहवादी और आलोचक होंगे, हमें शिकायत, मांग, विरोध करते रहना चाहिए -यह भी लोकतंत्र की एक विशेषता है। हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी भी सरहाना करनी चाहिये।’ भारत सरकार और खासकर छत्तीसगढ़ सरकार पर यह बात लागू नहीं होती है। विनायक सेन को यही सरकार मानवाधिकार के फर्ज अदा करने के जुल्म में जेल में डाल दिया तथा हिमांशु कुमार को सलवा जुडुम में जले हुये गांव को बसाने की सजा उनके आश्रम को तोड़ कर दी। यह वही सरकार है जिसने असामाजिक तत्वों को लेकर ‘सामाजिक एकता मंच’ बनाया और मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार मालनी सुब्रमण्यम के घर पर हमला करवाया। यह वही संगठन है जो बेला भाटिया और सोनी सोढी के खिलाफ प्रदर्शन करता है। इसी प्रदेश में 50 से अधिक पत्रकारों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं और चार पत्रकार संतोष यादव व सोमारू नाग जेल में बंद हैं। इन पत्रकारों का गुनाह यह है कि वे अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुये सही बात कहना चाह रहे थे, अन्य पत्रकारों जैसा पुलिस की कही बातों को सही मान कर रिर्पोटिंग करने वाले नहीं थे। वे उस तरह के पत्रकार नहीं थे जो गोटेकदम में अपनी पिस्तौल से घायल जवान को मुठभेड़ में घायल की खबर छाप देते और उसी जगह दर्जनों महिलाओं के साथ हुई यौनिक हिंसा पर चुप रहते। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि आलोचक और विरोध करने वालों की बात सुनी जा रही है। क्या यह सब घटनायें आप तक नहीं पहुंचतीं? अगर पहुंचती है तो आप चुप क्यों हैं और नहीं पहुंचती तो उसके कारण क्या हैं?

महोदय, आपने ही अपने पिछले सम्बोधन में कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी से जनता गुस्से में है।’ बिल्कुल सही फरमाया था आपने। छत्तीसगढ में आदिवासियों को इसलिए मारा जा रहा है कि वे जिस जमीन पर रहते हैं और जिस जंगल को उन्होंने बचा कर रखा है, उसके अन्दर अकूत खनिज सम्पदा है। वह खनिज सम्पदा देशी-विदेशी लूटेरों (पूंजीपतियों) को चाहिए। इसके लिए यह सरकार इन आदिवासियों को हटाना चाहती है और वे हटना नहीं चाहते। वे अपनी जीविका के साधन, मातृभूमि और अपनी संस्कृति की रक्षा कर अपने तरीके से जीना चाहते हैं। आप जिस देश के महामहिम हैं उस देश की सरकार उनको इस तरह जीने देना नहीं चाहती है। वह उनके उपर हमले करवा रही है। सलवा जुडूम के नाम पर 650 गांवों को जला दिया गया, हजारों लोगों को मारा गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। खुले में रहने वाले आदिवासी समाज को यह सरकार कैम्पों (इन कैम्पों का खर्च टाटा और एस्सार ने दिया) में डाल दिया। जो कैम्प में नहीं आये उसको माओवादी घोषित कर दिया। सरकार की नजर में आदिवासी गुलाम हैं, नहीं तो बागी (माओवादी)। इन बागियों के पास बैंक अकाउंट नहीं हैं, न ही इनके पास घर हैं। ये प्रकृति के सहारे जिन्दा रहते हैं। महामहिम जी, आपके ‘बहादुर सुरक्षा बल’ सेटेलाइट और यूएवी (मानवरहित एरियल व्हेकल) के सहारे आधुनिक हथियारों, मोर्टारों, हेलीकाप्टरों से लैस होकर छत्तीसगढ़ जनता पर हमले कर रहंे हैं। निहत्थे महिलाओं, बच्चे-बूढ़े, नौजवानों पर हमले करना उनके साथ यौनिक हिंसा और फर्जी मुठभेड़ में मारना दिनचर्या बन गई है।

सुरक्षा बल सुकुमा जिले के गोमपाड़ गांव की महिला गोमपाड के साथ बलात्कार करता है और अपने कुकर्मों को छिपाने के लिये उसकी हत्या कर देता है। यह इस तरह का फर्जी इनकांउटर था कि कोई भी उस महिला के लाश को देख कर समझ सकता है। सोनी सोढी इस मामले की जानकारी लेने महिला के गांव तक जाना चाहती है तो उन्हें पुलिस और सलवा जुडूम के गुंडों द्वारा रोका जाता है। इस पर न तो देश का सुप्रीम कोर्ट, न राष्ट्रपति भवन और न ही गृह मंत्रालय वहां की वास्तविकता को जानना चाहता है। भारत मां के जयकारे लगा कर उन्माद फैलाने वालों के लिये गोमपाड की मौत कोई मौत नहीं है।

इस तरह के फर्जी गिरफ्तारी और इनकांउटर पर अफसरों को फटकार लगाने वाले सुकमा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रभाकर ग्वाल को एसपी के शिकायत पर सस्पेंड कर दिया जात है। इस तरह की खबरें बाहर नहीं आ पाये, इसके लिये फैक्ट फाइडिंग (तथ्यपरक खोज) टीम के उपर भी सरकारी दमन किया जा रहा है। अभी हाल ही में जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालयों से प्रोफेसरों की एक टीम गई थी, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से फंसाने का प्रयास किया। इस तरह के फर्जीवाड़े का मास्टर माइंड बस्तर रेंज के आईजी एसआरपी कल्लूरी ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है कि इस तरह के लोगों पर खुफिया विभाग द्वारा नजर रखनी चाहिये। कल्लूरी चाहते हैं कि रायपुर के एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड और ट्रेवल एजेंसियों के स्थल पर इस तरह के लोगों की आवाजाही पर नजर रखी जाये।

ये सारे हथकंडे इसलिये अपनाये जा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में जो अकूत खनिज सम्पदा है उसको लूटा जाये। छत्तीसगढ़ में कोयला 52,533 मिलियन टन, लौह अयस्क 2,731 मिलियन टन, चूना पत्थर 9,038 मिलियन टन, बाक्साईट 148 मिलियन टन, हीरा 13 लाख कैरेट की खनिज सम्पदा है। इसके अलावा और भी खनिज सम्पदा छत्तीसगढ़ में है। इस खनिज सम्पदा को देशी-विदेशी धन पिपाशु लूटना चाहते हैं, जिसके लिये सितम्बर 2009 तक 4 बड़ी कम्पनियों को बिलासपुर, रायपुर, राजानन्दगांव और रायगढ़ में 6,836 हेक्टेअर जमीन देने का निश्चय किया था। टाटा कोे बस्तर में 5.5 मिलियन टन का स्टील प्लांट लागने के लिए 2,044 हेक्टेअर भूमि चाहिए, जिसके लिए 6 जून 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इकरारनामा हुआ है। इसके अलावा और सैकड़ों इकरारनामें हुये हंै जिसमें छत्तीसगढ की लाखों हेक्टेअर जमीन जानी है। इस लूट को पूरा करने में अमेरिका और इस्राईल जैसे देशों की भी भागीदारी रही है। वे यहां के आदिवासियों को खत्म करने के लिये हथियारों से लेकर ट्रेनिंग तक दे रहे हैं। वे अपने एक्सपर्ट को छत्तीसगढ़ भेजते हैं ताकि आदिवासियों के संघर्ष को समाप्त कर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट को बढ़ाया जा सके।

रोज-रोज के फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियों से आदिवासियों के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। आदिवासी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संगठित होकर लड़ रहे हैं, चाहे आप इनके संघर्ष को जिस नाम से पुकारें। इस लूट को बनाये रखने के लिये भारत सरकार, छत्तीसगढ सरकार जितना भी फर्जी मुठभेड़ में लोगों को मारे, महिलाओं के साथ बलात्कार करे, शांतिप्रिय-न्यायपसंद लोगों को धमकाये और उन पर हमले कराये, लेकिन वह शांति स्थापित नहीं कर सकती है। राष्ट्रपति जी, आपने पूछा था कि‘शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव का समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों रहा है?’ जब तक मुट्ठी भर धन पिपाशुओं के लिए आम जनता की जीविका के साधन (जल-जंगल-जमीन) छिनते जायेंगे, तब तक यह टकराव रहेगा। जब तक विकास के नाम पर विनाश का खेल चलता रहेगा, तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती है। यही आपके प्रश्नों के उत्तर हैं।



कब तक देश की शोषित-पीड़ित जनता, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला मुद्दों पर अलग-अलग लड़ती रहेगी? क्या हम सब की लड़ाई एक नहीं है? क्या हमारा साझा दुश्मन सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद नहीं है? क्या हमारी अलग-अलग लड़ाई इन ताकतों के लिए फायदेमंद नहीं है? दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएं, मजदूर, किसान एक होकर लड़ें यही समय का तकाजा है।

Wednesday, October 19, 2016

Tuesday, August 16, 2016

street view





with Nepalese and Punjabi Community members in WCI2016

with Katherine Maher

 
With Katherine Maher, executive director of the Wikimedia Foundation in Wiki Conference India 2016, Chandigarh
Soure:https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/3/37/Katherine_Maher_in_WCI2016.jpg

WikiConference India 2016

Malayalam Community with Katherine Maher and Manpreet Kaur

Me with Tulu Community Members in WCI 2016

With Bangladesh Community Members

In Hack-a-thon team

WikiConference India 2016 (Chandigarh)

Tuesday, June 21, 2016

छत्तीसगढ़ के आदिवासी जनता पर बढ़ता राजकीय दमन





सुनील कुमार

भारत अपने को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और इसी वर्ष भारत ने अपना67 वां गणतंत्र दिवस मनाया। लोकतंत्र-गणतंत्र पर नेता, मंत्री, अधिकारी बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं जो सुनने में बहुत अच्छी लगती है और हमें गर्व महसूस होता है कि हम लोकतांत्रिक देश में जी रहे हैं। यह गर्व और खुशफहमी तभी तक रहती है जब तक हम अपनी स्वतंत्रता और संविधान में दिये हुये अधिकार की बात न करें। 67 वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा कि ‘‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है।’’ राष्ट्रपति की यह बात क्या भारत जैसे‘लोकतांत्रिक’, ‘गणतांत्रिक’ देश में लागू होती है? भारत का संविधान अधिकार यहां के प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार देता है कि वह अपनी पसंद से विचारधारा, धर्म, भारत में रहने का जगह, व्यवसाय को चुन सकता है। क्या भारतीय संविधान लागू होने के 67साल बाद भी यह अधिकार भारत की आम जनता को मिला है? यह हम सभी के लिए यक्ष प्रश्न बना हुआ है। आज भी दलितों, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, आदिवासियों,पर हमले हो रहे हैं। दलितों के आज भी हाथ-पैर काटे जा रहे हैं, रोहित वेमुला जैसे होनहार छात्र को आत्महत्या करने की स्थिति में पहुंचा दिया जाता है। होनहार अल्पसंख्यक नौजवान को आतंकवाद के नाम पर पकड़ कर जेलों में डाल दिया जा रहा है। महिलाओं, यहां तक कि छोटी-छोटी बच्चियों को रोजाना बलात्कार का शिकार होना पड़ रहा है। आईएएस, पीसीएस महिलाओं को भी मंत्रियों और सीनियर के हाथों खुलेआम शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है। उन्हें उनके ईशारों पर चलना होता है और ऐसा नहीं होने पर उनको ट्रांसफर से लेकर कई तरह की जिल्लत झेलने पड़ती हैं। इस तरह की खबरें शहरी क्षेत्र में होने के कारण थोड़ी-बहुत मीडिया या सोशल मीडिया में आ जाती हंै।

इस देश के मूलवासी आदिवासी को छत्तीसगढ़ सरकार और भारत सरकार लाखों की संख्या में अर्द्धसैनिक बल भेजकर प्रतिदिन मरवा रही है। उनकी बहु-बेटियों के साथ बलात्कार तो आम बात हो गई है। अर्द्धसैनिक बलों द्वारा उनके घरों के मुर्गे, बकरे,आनाज, खाना और पैसे-गहने लूट कर ले जाना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यह सब करने के बाद उनको पुरस्कृत भी किया जाता है, जैसे सोनी सोढी के गुप्तांग में पत्थर डालने वाले अंकित गर्ग को 2013 में राष्ट्रपति द्वारा वीरता पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। छत्त्ीासगढ़ में आदिवासियों पर हो रहे जुल्म की खबरें शायद ही कभी समाचार पत्रों में छपती हैं। थोड़ी-बहुत खबर तब बनती है जब समाज के प्रहरी मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार उस ईलाके में जाकर कुछ खोज-बीन कर पाते हैं। लेकिन यह खबर मीडिया के टीआरपी बढ़ाने के लिये नहीं होती है इसलिए उसे प्रमुखता नहीं दी जाती है। राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर तब आती है जब 28जून, 2012 की रात बीजापुर के सरकिनागुड़ा जैसी घटना होती है जिसमें 17 ग्रामीणों को (इसमें 6 बच्चे थे) मौत की नींद सुला दी जाती है। इस खबर पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती है कि बहादुर जवानों को बड़ी सफलता मिली है। ऐसी ही कुछ घटनाएं हाल के दिनों में लगातार हो रही है जो कुछ समाचार पत्रों और मीडिया मंे आ पायी हैं। लेकिन इस तरह की खबरें भी आम जनता तक पहुंच नहीं पातीं।

30 अक्टूबर, 2015 को रष्ट्रीय स्तर की महिलाओं का एक दल जगदलपरु और बीजापुर गया था। इस दल को पता चला कि 19/20 से 24 अक्टूबर, 2015 के बीच बासागुडा थाना अन्तर्गत चिन्न गेल्लूर, पेदा गेल्लूर, गंुडुम और बुड़गी चेरू गांव में सुरक्षा बलों ने जाकर गांव की महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और मारपीट की। पेदा गेल्लूर और चिन्ना गेल्लूर गांव में ही कम से कम 15 औरतें मिलीं, जिनके साथ लैंगिक हिंसा की वारदातें हुई थीं। इनमें से 4 महिलायें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कर्राइं। इन महिलाओं में एक 14 साल की बच्ची तथा एक गर्भवती महिला थीं,जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। गर्भवती महिला के साथ नदी में ले जाकर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। महिलाओं के स्तनों को निचोड़ा गया,उनके कपड़े फाड़ दिये गये। जांच दल की टीम ने कई महिलाओं पर चोट के निशान देखे, कई महिलाएं ठीक से चल नहीं पा रही थीं। मारपीट, बलात्कार के अलावा इनके घरों के रुपये-पैसों को लूटा गया, उनके चावल, दाल, सब्जी व जानवरों को खा लिए गये और जो बचा वह साथ में ले गये। घरों में तोड़-फोड़ किया गया और उनके टाॅर्च,चादर, कपड़े भी लूटे गये। यह टीम समय की कमी के कारण सभी गांवों में नहीं जा पाई थी। इन महिलाओं के बयान दर्ज कराने के बावजूद अभी तक किसी पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस बीच में काफी फर्जी मुठभेड़ और बलात्कार की घटनाएं हुईं। 15 जनवरी, 2106को सीडीआरओ (मानवाधिकार संगठनों का समूह) और डब्ल्यूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) की टीम छत्तीसगढ़ गई थी। इस टीम का अनुभव भी अक्टूबर में गई टीम जैसा ही था। 11 जनवरी, 2016 को सुकमा जिले के कुकानार थाना के अन्तर्गत ग्राम कुन्ना गांव के पहाड़ियों पर ज्वांइट फोर्स (सी.आर.पी.एफ., कोबरा, डीआरजी, एसपीओ) के हजारों जवानों (लोकल भाषा में बाजार भर) ने डेरा डाल रखा था। कुन्ना गांव में पेद्दापारा, कोर्मा गोंदी, खास पारा जैसे दर्जन भर पारा (मोहल्ला) हैं। यह गांव मुख्य सड़क से करीब 15-17 कि.मी. अन्दर है और गांव के लोगों को सड़क तक पहुंचने के लिए 3 घंटे लगते हैं। 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बलों, एसपीओ और जिला रिजर्व फोर्स के जवानों ने गांव को घेर लिया। पेद्दापार के ऊंगा खेती करते हैं और आंध्रा जाकर ड्राइवर का काम भी करते हैं। फोर्स ने उनके घर का दरवाजा तोड़ दिया, घर में रखे 500 रुपये ले लिये और 10 किलो चावल, 5 किलो दाल और 5 मुर्गे खा लिये। उनकी पत्नी सुकुरी मुसकी के अन्डर गारमेंट जला दिये और उनके घर के दिवाल पर यह लिख दिये -‘‘फोन कर9589117299 आप का बलाई सतडे कर।’’ ऊंगा का आधार कार्ड भी फोर्स वाले लेकर चले गये। इसी तरह गांव के अन्य घरों में तोड़-फोड़ की। चावल, दाल, सब्जी, मुर्गे,बकरी खाये और मरक्का पोडियामी के घर में लगे केले के पेड़ से केले काट कर ले गये। मुचाकी कोसी, करताम हड़मे, करतामी गंगी, हड़मी पेडियामी, कारतामी कोसी,पोडियामी जोगी व हिड़मे भड़कामी सहित कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार व लैंगिक हिंसा किया। महिलाओं ने सोनी सोढी के नेतृत्व में बस्तर संभाग के कमिश्नर के पास शिकायत की। इन महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उनके स्तन को निचोड़ा गया। कुंआरी लड़कियां अपने बहनों के मंगलसूत पहन कर अपने को विवाहित बतायी, क्योंकि गांव में 17-18 साल की लड़की अगर शादी-शुदा नहीं है तो उसको माओवादी मान लिया जाता है। इस गांव के 29 लोगों (24 पुरुष, 5महिला) को पकड़ कर पुलिस ले गई, जिनमें से तीन पर फर्जी केस लगा कर जेल भेज दिया गया। गांव वालों को ले जाते समय रास्ते में बुरी तरह मारा-पीटा गया,महिलाओं के कपड़े फाड़े गये।

कोर्मा गोंदी में 13 जनवरी, 2016 को यही सुरक्षा बल गये और अन्दावेटी का मोबाईल फोन और 500 रुपये छीन लिये। इसी तरह गांव के अन्य लोगों के साथ मारपीट किये और खाद्य सामग्री सहित मुर्गे खा गये। इसी गांव के लालू सोडी (21), पुत्र सोडी लक्कमा को पुलिस ने पकड़ा और बुरी तरह पीटा। इस पिटाई से उसकी 14 जनवरी को मृत्यु हो गई, जिसका एफआईआर दर्ज नहीं हुआ। इसी पारा के योगा सोरी, पुत्र सोरी लक्का को फोर्स के तीन लोगों ने सुबह 9 बजे घर से खींच लिया और उसे गांव से एक किलोमीटर दूर ले जाकर मारा। उसके पैरों में काफी चोट आई, जिससे वह दो दिन तक चल नहीं पाया। इसी पारा के इरम्मा, देवाश्रम और सोमा को 12जनवरी को पकड़ कर कुकानार थाने ले गये और पांच-पांच पुलिस वालों ने उनके साथ रास्ते में मारपीट की। 15 तारीख को सादे कागज पर हस्ताक्षर लेकर उनको छोड़ दिया गया।

पेद्दापारा से कुछ दूर गोटेकदम गांव के योगिरापारा में फोर्स गई और उसने फायरिंग करना शुरू की। उस समय लोग बांध निर्माण का कार्य कर रहे थे, जो मनरेगा द्वारा 9लाख रुपये में बन रहा है। फोर्स की फायरिंग की आवाज सुनकर लोग काम छोड़ कर भाग गये। फोर्स ने घरों में घुसकर तलाशी लेनी शुरू की और महिलाओं के साथ छेड़खानी की। घरों में तलाशी के दौरान अरूमा के घर पर एक जवान बोरे (जिसमें समान रखा था) पर लात मार रहा था तो वह फिसल कर गिर गया। उसकी अपनी बंदूक से गोली चल गई जो उसके पैर में लगी और वह घायल हो गया। भीमा की मोटर बाईक से घायल जवान को ईलाज के लिए दो जवान लेकर गये और उसको बाईक वापस नहीं किये। अखबार में सुबह छपा कि माओवादी-पुलिस मुठभेड़ में एक जवान घायल हो गया। पुलिस 14 तारीख तक गांव में रही और तब तक गांव के पुरुष जंगल में भूखे-प्यासे छिपे रहे।

बीजापुर के बासागुडा थाना अन्तर्गत बेलम नेन्द्रा व गोटुम पारा में 12 जनवरी, 2016को सुरक्षा बल के ज्वांइट फोर्स गांव में तीन दिन तक रूकी रही। इन तीन दिनों में वे गांव के मुर्गे, बकरे को बनाये, खाये या और दारू भी पिये। कराआईती के घर में 7जगहों पर खाना बनाये और दारू पिये। कराआईती के घर के 40 मुर्गे, 105 कि.ग्रा. चावल, 2 किलो मूंग दाल, बरबटी खाये और दो टीन तेल (एक टीन कोईना का और एक सरसों का) खत्म कर दिये। घर में रखे 10 हजार रू. भी ले गये। कराआईती के घर में खाने के साथ दारू भी पिये, जिसके बोतल आस-पास पड़े हुये थे।

मारवी योगा के घर के 14 मुर्गे, 10 किलो चावल, मूंग दाल, सब्जी और टमाटर खा गये, जिन्हंे वे शनिवार को बाजार से लाये थे। वे अपने साथ बड़े भाई की बेटी को रखते हैं जिसको फोर्स वाले ने गोंडी में कहा कि सभी औरतंे एक साथ रहो, रात में बतायेंगे। यहां तक कि एक घर से काॅपी और पेन भी ले गये। गांव में रूकने के दौरान दर्जनों महिलाओं के साथ बलात्कार और यौनिक शोषण किये। इससे पहले भी6 जनवरी को सुरक्षा बलों के जवान गये थे। तब उन्होंने मरकमनन्दे को पीटा था,उसकी बकरी ले गये थे और लैंगिक इस हिंसा भी की थी। इस गांव को सलवा जुडूम के समय दो बार जला दिया गया था।

जब ये पीड़ित महिलाएं बीजापुर आयीं तो पुलिस अधीक्षक इनकी शिकायत लेने को तैयार नहीं थे। इनको थाने के अंदर डराया-धमकाया गया। दो-तीन दिन बाद देश भर से जब एसपी-डीएम को फोन गया तो इनकी शिकायत सुनी गई।

राष्ट्रपति की यह बात कि ‘हमारी उत्कृष्ट विरासत लोकतंत्र की संस्थाएं सभी नागरिकों के लिये न्याय, समानता तथा लैंगिक और आर्थिक समता सुनिश्चित करती है’, आम आदमी पर तो लागू नहीं होती है। हां, यह बात जज साहब जैसे लोगों के लिए जरूर है जिनके लिये बकरी पर भी केस दर्ज हो जाता है। राष्ट्रपति इसी सम्बोधन में आगे कहते हैं कि ‘हमारे बीच सन्देहवादी और आलोचक होंगे, हमें शिकायत, मांग, विरोध करते रहना चाहिए -यह भी लोकतंत्र की एक विशेषता है। हमारे लोकतंत्र ने जो हासिल किया है, हमें उसकी भी सरहाना करनी चाहिये।’ भारत सरकार और खासकर छत्तीसगढ़ सरकार पर यह बात लागू नहीं होती है। विनायक सेन को यही सरकार मानवाधिकार के फर्ज अदा करने के जुल्म में जेल में डाल दिया तथा हिमांशु कुमार को सलवा जुडुम में जले हुये गांव को बसाने की सजा उनके आश्रम को तोड़ कर दी। यह वही सरकार है जिसने असामाजिक तत्वों को लेकर ‘सामाजिक एकता मंच’बनाया और मानवाधिकार कार्यकर्ता, पत्रकार मालनी सुब्रमण्यम के घर पर हमला करवाया। यह वही संगठन है जो बेला भाटिया और सोनी सोढी के खिलाफ प्रदर्शन करता है। इसी प्रदेश में 50 से अधिक पत्रकारों पर अपराधिक मामले दर्ज हैं और चार पत्रकार संतोष यादव व सोमारू नाग जेल में बंद हैं। इन पत्रकारों का गुनाह यह है कि वे अपने पत्रकारिता धर्म को निभाते हुये सही बात कहना चाह रहे थे, अन्य पत्रकारों जैसा पुलिस की कही बातों को सही मान कर रिर्पोटिंग करने वाले नहीं थे। वे उस तरह के पत्रकार नहीं थे जो गोटेकदम में अपनी पिस्तौल से घायल जवान को मुठभेड़ में घायल की खबर छाप देते और उसी जगह दर्जनों महिलाओं के साथ हुई यौनिक हिंसा पर चुप रहते। राष्ट्रपति महोदय ने कहा कि आलोचक और विरोध करने वालों की बात सुनी जा रही है। क्या यह सब घटनायें आप तक नहीं पहुंचतीं? अगर पहुंचती है तो आप चुप क्यों हैं और नहीं पहुंचती तो उसके कारण क्या हैं?

महोदय, आपने ही अपने पिछले सम्बोधन में कहा था कि ‘भ्रष्टाचार तथा राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी से जनता गुस्से में है।’ बिल्कुल सही फरमाया था आपने। छत्तीसगढ में आदिवासियों को इसलिए मारा जा रहा है कि वे जिस जमीन पर रहते हैं और जिस जंगल को उन्होंने बचा कर रखा है, उसके अन्दर अकूत खनिज सम्पदा है। वह खनिज सम्पदा देशी-विदेशी लूटेरों (पूंजीपतियों) को चाहिए। इसके लिए यह सरकार इन आदिवासियों को हटाना चाहती है और वे हटना नहीं चाहते। वे अपनी जीविका के साधन, मातृभूमि और अपनी संस्कृति की रक्षा कर अपने तरीके से जीना चाहते हैं। आप जिस देश के महामहिम हैं उस देश की सरकार उनको इस तरह जीने देना नहीं चाहती है। वह उनके उपर हमले करवा रही है। सलवा जुडूम के नाम पर650 गांवों को जला दिया गया, हजारों लोगों को मारा गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। खुले में रहने वाले आदिवासी समाज को यह सरकार कैम्पों (इन कैम्पों का खर्च टाटा और एस्सार ने दिया) में डाल दिया। जो कैम्प में नहीं आये उसको माओवादी घोषित कर दिया। सरकार की नजर में आदिवासी गुलाम हैं,नहीं तो बागी (माओवादी)। इन बागियों के पास बैंक अकाउंट नहीं हैं, न ही इनके पास घर हैं। ये प्रकृति के सहारे जिन्दा रहते हैं। महामहिम जी, आपके ‘बहादुर सुरक्षा बल’ सेटेलाइट और यूएवी (मानवरहित एरियल व्हेकल) के सहारे आधुनिक हथियारों,मोर्टारों, हेलीकाप्टरों से लैस होकर छत्तीसगढ़ जनता पर हमले कर रहंे हैं। निहत्थे महिलाओं, बच्चे-बूढ़े, नौजवानों पर हमले करना उनके साथ यौनिक हिंसा और फर्जी मुठभेड़ में मारना दिनचर्या बन गई है।

सुरक्षा बल सुकुमा जिले के गोमपाड़ गांव की महिला गोमपाड के साथ बलात्कार करता है और अपने कुकर्मों को छिपाने के लिये उसकी हत्या कर देता है। यह इस तरह का फर्जी इनकांउटर था कि कोई भी उस महिला के लाश को देख कर समझ सकता है। सोनी सोढी इस मामले की जानकारी लेने महिला के गांव तक जाना चाहती है तो उन्हें पुलिस और सलवा जुडूम के गुंडों द्वारा रोका जाता है। इस पर न तो देश का सुप्रीम कोर्ट, न राष्ट्रपति भवन और न ही गृह मंत्रालय वहां की वास्तविकता को जानना चाहता है। भारत मां के जयकारे लगा कर उन्माद फैलाने वालों के लिये गोमपाड की मौत कोई मौत नहीं है।

इस तरह के फर्जी गिरफ्तारी और इनकांउटर पर अफसरों को फटकार लगाने वाले सुकमा के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रभाकर ग्वाल को एसपी के शिकायत पर सस्पेंड कर दिया जात है। इस तरह की खबरें बाहर नहीं आ पाये, इसके लिये फैक्ट फाइडिंग (तथ्यपरक खोज) टीम के उपर भी सरकारी दमन किया जा रहा है। अभी हाल ही में जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालयों से प्रोफेसरों की एक टीम गई थी, जिनको पुलिस ने फर्जी तरीके से फंसाने का प्रयास किया। इस तरह के फर्जीवाड़े का मास्टर माइंड बस्तर रेंज के आईजी एसआरपी कल्लूरी ने सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है कि इस तरह के लोगों पर खुफिया विभाग द्वारा नजर रखनी चाहिये। कल्लूरी चाहते हैं कि रायपुर के एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, बस स्टैण्ड और ट्रेवल एजेंसियों के स्थल पर इस तरह के लोगों की आवाजाही पर नजर रखी जाये।

ये सारे हथकंडे इसलिये अपनाये जा रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में जो अकूत खनिज सम्पदा है उसको लूटा जाये। छत्तीसगढ़ में कोयला 52,533 मिलियन टन, लौह अयस्क 2,731 मिलियन टन, चूना पत्थर 9,038 मिलियन टन, बाक्साईट 148मिलियन टन, हीरा 13 लाख कैरेट की खनिज सम्पदा है। इसके अलावा और भी खनिज सम्पदा छत्तीसगढ़ में है। इस खनिज सम्पदा को देशी-विदेशी धन पिपाशु लूटना चाहते हैं, जिसके लिये सितम्बर 2009 तक 4 बड़ी कम्पनियों को बिलासपुर,रायपुर, राजानन्दगांव और रायगढ़ में 6,836 हेक्टेअर जमीन देने का निश्चय किया था। टाटा कोे बस्तर में 5.5 मिलियन टन का स्टील प्लांट लागने के लिए 2,044हेक्टेअर भूमि चाहिए, जिसके लिए 6 जून 2005 में छत्तीसगढ़ सरकार के साथ इकरारनामा हुआ है। इसके अलावा और सैकड़ों इकरारनामें हुये हंै जिसमें छत्तीसगढ की लाखों हेक्टेअर जमीन जानी है। इस लूट को पूरा करने में अमेरिका और इस्राईल जैसे देशों की भी भागीदारी रही है। वे यहां के आदिवासियों को खत्म करने के लिये हथियारों से लेकर ट्रेनिंग तक दे रहे हैं। वे अपने एक्सपर्ट को छत्तीसगढ़ भेजते हैं ताकि आदिवासियों के संघर्ष को समाप्त कर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी लूट को बढ़ाया जा सके।

रोज-रोज के फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियों से आदिवासियों के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है। आदिवासी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संगठित होकर लड़ रहे हैं, चाहे आप इनके संघर्ष को जिस नाम से पुकारें। इस लूट को बनाये रखने के लिये भारत सरकार, छत्तीसगढ सरकार जितना भी फर्जी मुठभेड़ में लोगों को मारे,महिलाओं के साथ बलात्कार करे, शांतिप्रिय-न्यायपसंद लोगों को धमकाये और उन पर हमले कराये, लेकिन वह शांति स्थापित नहीं कर सकती है। राष्ट्रपति जी, आपने पूछा था कि‘शांति प्राप्त करना इतना दूर क्यों है? टकराव का समाप्त करने से अधिक शांति स्थापित करना इतना कठिन क्यों रहा है?’ जब तक मुट्ठी भर धन पिपाशुओं के लिए आम जनता की जीविका के साधन (जल-जंगल-जमीन) छिनते जायेंगे, तब तक यह टकराव रहेगा। जब तक विकास के नाम पर विनाश का खेल चलता रहेगा,तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती है। यही आपके प्रश्नों के उत्तर हैं।

कब तक देश की शोषित-पीड़ित जनता, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिला मुद्दों पर अलग-अलग लड़ती रहेगी? क्या हम सब की लड़ाई एक नहीं है? क्या हमारा साझा दुश्मन सामंतवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद नहीं है? क्या हमारी अलग-अलग लड़ाई इन ताकतों के लिए फायदेमंद नहीं है? दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक, महिलाएं, मजदूर,किसान एक होकर लड़ें यही समय का तकाजा है।

Sunday, May 8, 2016

‘प्रधान सेवक’ से नम्बर वन ‘मजदूर’

- सुनील कुमार
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1 मई, 2916 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में ‘उज्जवला योजना’ की शुरूआत की। भारत के प्रधानमंत्री ‘योजना’ लागू करने और प्रधानमंत्री का उपनाम रखने के मास्टरमाइंड (ऐसे वह बहुत सारे चीजों के वे मास्टरमाडंड हैं) रहे हैं। अभी तक वे दर्जन भर योजना चला चुके हैं जिनमें कई योजनाएं बहु प्रचारित रही हैं। इन योजनाओं के प्रचार में करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं और उसके परिणाम भी हमारे सामने हैं। वैसी हीे एक योजना की शुरूआत एक मई को की गई।

एक मई को पूरे दुनिया में मई दिवस (मजदूरों की मुक्ति का दिन) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन दुनिया भर के मिहनतकश हितैषी संगठन/व्यक्ति मिहनतकश जनता के बिच लाल झंडे के साथ जाते हैं और मिहनतकश जनता की मुक्ति, मिहनतकश की सत्ता हासिल करने की बात करते हैं। इसी दिन भारत के ‘प्रधानसेवक’ नरेन्द्र मोदी एलपीजी सिलेण्डर (उसका रंग भी लाल होता है) लेकर बलिया पहुंचे (उत्तर प्रदेश में उनको भी सत्ता हासिल करना है)। उसी दिन हम सभी को पता चला कि भारत के प्रधानमंत्री, जो देश के ‘प्रधान सेवक’ और देश के ‘चौकीदार’ थे दो साल की ‘कड़ी मिहनत’ के बाद देश के नम्बर वन ‘मजदूर’ बन गये हैं। देश के ‘प्रधान सेवक’ की बातों में सच्चाई है, लेकिन वे पूरी सच्चाई नहीं बताये हैं। देश के प्रधानमंत्री, नम्बर वन मजदूर हैं लेकिन जनता के लिये नहीं। देश की आम जनता उनकी परछाई को भी स्पर्श नहीं कर सकती। वे मजदूर हैं बड़े-बड़े धन्नासेठों के लिये, जो देश-दुनिया को लूट कर अपनी तिजोरी भरना चाहते हैं। उसके लिये देश का नम्बर वन मजदूर दिन-रात काम करते हैं, आम जनता के पैसे से विदेशों का भ्रमण करते हैं ताकि इन देशी-विदेशी लूटेरों की लूट को बढ़ा सकें। देश के प्रधानमंत्री जब इन पूंजीपतियों के लिये नम्बर वन मजदूर बन चुके हैं तो इस देश के मजदूर इनके लिये गुलाम बन चुके हैं। मोदी सरकार ने दो साल में जो श्रम विरोधी नीतियां लाई है उससे हाशिये पर जी रहे मजदूरों की हालत गुलामों से भी बदतर हो गई है। मजदूरों के संगठित होने के अधिकारों पर कुठाराघात किया जा रहा है। जब भी मजदूर संगठित होने का प्रयास किया, उनके ऊपर दमन किया गया। हम मारूति, होंडा के मजदूरों पर हो रहे राजकीय उत्पीड़न को भी देख-समझ सकते हैं। हाल के दो-चार वर्षों में ऐसे दर्जनों उत्पीड़न मजदूरों के ऊपर हो चुके हैं, हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री कहते हैं कि ‘‘भाइयों-बहनों बोनस का कानून हमारे देश में सालों से है। बोनस का कानून यह था कि दस हजार रू0 से अगर कम आय है और कम्पनी बोनस देना चाहती है तो उसी को मिलेगा। आज के जमाने में 10 हजार रू. की आय कुछ नहीं होती है और उसके कारण अधिकतम श्रमिकों को बोनस नहीं मिलता था। हमने आकर निर्णय किया कि मिनिमम इन्कम 10 हजार से बढ़ाकर 21 हजार रू. कर दी जाए।’’ प्रधानमंत्री जी आप न्यूनतम मजदूरी को ही 21 हजार रू. क्यों नहीं कर देते हैं? मजदूरों को बोनस इसलिए नहीं मिलता है कि उनकी तनख्वाह 10 हजार रू. से अधिक है, बल्कि इसलिए नहीं मिलता है कि मालिक मजदूरों को कम से कम पैसा देता है। उनको बोनस तो दूर की बात है, न्यूनतम मजदूरी 8-9 हजार रू. भी नहीं दी जाती है। अधिकांश मजदूरों को 5-6 हजार रू. प्रति माह पर काम करना पड़ता है। ईएसआई, पीएफ व छुट्टियां तो दूर की बात है उनको सप्ताहिक छुट्टी तक नहीं मिल पाती है। मजदूरों ने लड़ कर जो आठ घंटे काम का अधिकार लिया था उसको छिना जा रहा है, मजदूरों से 10-12 घंटे काम लेना आम बात है। प्रधानमंत्री इन अधिकारों पर चुप क्यों हैं? आप इनको ये अधिकार कब दिलायेंगे? गार्जियानो, निप्पोन, मारूति, होंडा जैसे लाखों मजदूरों को कब तक प्रताडि़त किया जाता रहेगा, कब तक उनको जेलों में रखा जायेगा? क्या यह आपको मालूम नहीं है? आप बताते हैं कि मजदूरों के पीएफ का 27 हजार करोड़ रू. पड़े हुये हैं जिसका कोई सूध लेने वाला नहीं था आपने उसका सूध लिया और मजदूरों के लिये ‘लेबर आइडेन्टि नम्बर’ जारी करने की बात बताये। अब वह 27 हजार करोड़ रू. का मालिक बन सकेगा। आप यह बतायेंगे कि यह 27 हजार करोड़ रू. जिन मजदूरों का है उसको पता लगा कर आप कब तक उसे वापस करेंगे? आपने तो मजदूरों के अपने पैसे निकालने पर पाबंदी और टैक्स लगाने का तुगलकी फारमान सुना दिया था। भारी विरोध के कारण आपको मजबूरी में इस तुगलकी फरमान को वापस लेना पड़ा।

बलिया में भाषण देते हुये आपने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मंगल पाण्डे को याद किया। यह अच्छी बात है, याद करना चाहिये। लेकिन कुछ माह पहले ही उसी मंगल पाण्डे के ईलाके में क्रिकेट मैच की जीत की खुशी में दलित बस्ती को जला दिया गया, जिसको आप ने याद नहीं किया। उन पीडि़तों को यह भी आश्वासन नहीं दे पाये कि आगे से आप का उत्पीड़न नहीं होगा। आप तो बाबा साहेब अम्बेडकर की जयंती मना रहे हैं, बाबा साहेब को उचित सम्मान देने की बात करते हैं। लेकिन बाबा साहेब ने जिन दलितों की आवाज उठाई उन दलित बस्तियों को कुछ माह पूर्व जलाया जाना आप कैसे भूल गये? जबकि 150 साल पुराने मंगल पाण्डे आपको याद रहे।

आप कहते हैं कि हम बलिया में चुनाव अभियान के लिये नहीं आये हैं, हम तो हर राज्य में जाते हैं और वहां से योजना आरंभ करते हैं। सही बात है, अभी आपने फरवरी माह में छत्तीसगढ़ के बस्तर में ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन’ योजना का शुभारम्भ किया। इस योजना में स्मार्ट गांव का निर्माण किया जायेगा। लेकिन जिस बस्तर में गांव के गांव जला दिये गये उन गांव वालों की आपको याद नहीं आई। उनको आप यह आश्वास्त नहीं कर पाये कि आप अपने गांव में रहिये, आपके घरों को नहीं जालाया जायेगा, आपका जल-जंगल-जमीन सुरक्षित हैं, आपको फर्जी मुठभेड़ों में नहीं मारा जायेगा और ना ही आपको झूठे केसों में डाल कर जेलों में कैद किया जायेगा। आप ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान चलाये हैं लेकिन उनकी बेटियों को यह भी आश्वास्त नहीं कर पाये कि आपके साथ भारतीय अर्द्ध सैनिक बलों द्वारा बलात्कार नहीं किया जायेगा। यहां तक कि आप के छत्तीसगढ़ यात्रा से एक दिन पहले आदिवासी नेत्री सोनी सोरी पर हुये हमले पर कुछ बोलना उचित नहीं समझा। जबकि सोनी सोरी तो आपके ‘बेटी बचाओ’ के मकसद को ही पूरा कर रही थी। वह आदिवासी महिलाओं पर हो रहे हमले और बलात्कार के खिलाफ आवाज़ उठा रही थी। क्या आप इन गांवों, वहां कि महिलाओं को आश्वस्त कर पायेंगे कि आपको उजाड़ा नहीं जायेगा, मारा नहीं जायेगा?

प्रधानमंत्री एक करोड़ दस लाख लोगों द्वारा गैस सब्सिडी छोड़ने पर उनका शुक्रिया आदा करते हुये लोगों से तालियां बजवा रहे थे (जैसे एक मदारी वाला, बच्चों से तालिया बजवाता है कि ताली बजाओ, शोर मचाओ तब खेल दिखायेंगे)। प्रधानमंत्री जी, आप यह बता सकते हैं कि यह एक करोड़ दस लाख कौन-कौन हैं, वे अभी सरकार की कौन-कौन सुविधायें लेते हैं? आप गैस कनेक्शन बांट रहे हैं जिससे महिलाओं की स्वास्थ्य पर बुरा असर नहीं पड़े। लेकिन आप बता सकते हैं कि जिस देश में भूख से मौत होती है उस देश में एलपीजी सिलेण्डर कैसे भराये जायेंगे। आप के दौरे के दो-चार दिन बाद ही यूपी में भूख से मौत हुई। आप यूपी छोड़ दीजिये क्योंकि वहां सपा की सरकार है जो आपकी बात नहीं सुनती है। लेकिन आपके बगल फरिदाबाद में, जहां आपकी ही पार्टी की सरकार है, 4 मई को एक विधवा मां अपनी तीन बेटियों के साथ खुद जहर इसलिये खा ली कि वह रोटी का जुगाड़ नहीं कर पा रही थी। जिस देश में माताएं अपने शरीर को इसलिए बेचती है कि वह अपने बच्चों के लिये दो जून की रोटी जुटा पाये। आप कहते हैं कि यूपी के लोगों ने आपको भारी मतों से जिताया, जिसे आप ब्याज के साथ उनको लौटाना चाहते हैं। आप को यूपी की ही नहीं पूरे देश की जनता ने ही वोट दिया और आप ने उन पर ब्याज भी लगा दिया। जो दाल 80-90 रू. किलो मिल जाती थी उस दाल को आप चुनाव में खर्च किये गये पैसे के ब्याज सहित 200 रू. किलो तक बेचवा दिये। लोगों के खाते में 15 लाख रू. देने, युवाओं को रोजगार देने, महंगाई कम करने जैसे वादों का क्या हुआ? प्रधानमंत्री जी, अब तो आप लोगों की बात मत कीजिये, बहुत हो गया, कितना लोगों की सेवा के नाम पर मेवा खाते रहेंगे। आप ने खुद ही मान लिया है कि आप ‘प्रधान सेवक’ से देश के ‘मजदूर नम्बर वन’ हो गये है। बाकी जनता को आप गुलाम मत बनाइये।

Tuesday, March 29, 2016

बजट बिना एक राज्य







- अरुण जेटली

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया है। संविधान की धारा 356 तब लागू की जाती है जब राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हो जाएं कि किसी राज्य में संविधान के अनुसार शासन नहीं किया जा सकता और यह विश्वास करने के पर्याप्त आधार हैं।

उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी के एक गुट ने कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व और मुख्यमंत्री दोनों से असंतुष्ट होने का आरोप लगाया जिसके बाद राज्य में कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया। कांग्रेस पार्टी में विभाजन की वजह आंतरिक थीं। कांग्रेस पार्टी के नौ सदस्यों ने विधान सभा में विनियोग विधेयक, जो कि राज्य के बजट के लिए जरूरी था, के विरुद्ध मत देने का फैसला किया। 18 मार्च 2016 को 35 सदस्यों ने विनियोग विधेयक के विरुद्ध तथा 32 सदस्यों ने इसके पक्ष में मतदान किया। इन 35 सदस्यों में 27 भाजपा के तथा 9 कांग्रेस पार्टी के बागी गुट के सदस्य थे। इस बात के दस्तावेजी साक्ष्य हैं कि इन 35 सदस्यों ने विधान सभा सत्र से पहले और उस समय मतविभाजन की मांग की थी। विधान सभा की लिखित कार्यवाही से इस बात की पुष्टि हो जाती है कि सदस्यों ने मतविभाजन की मांग की थी लेकिन इसके बावजूद विनियोग विधेयक मतदान के बगैर पारित होने का दावा किया जा रहा है।

इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि विनियोग विधेयक वास्तव में मत विभाजन में गिर गया था। इसके परिणाम स्वरूप सरकार को त्यागपत्र देना पड़ा। इस घटनाक्रम के दो परिणाम और हैं। पहला, एक अप्रैल 2016 से व्यय की मंजूरी देने वाले विनियोग विधेयक को मंजूरी नहीं मिली थी। दूसरा, अगर विनियोग विधेयक पारित नहीं हुआ था तो 18 मार्च 2016 के बाद सरकार का सत्ता में बने रहना असंवैधानिक है। ध्यान देने वाली बात यह है कि आज की तारीख तक न तो मुख्यमंत्री और न ही विधान सभा अध्यक्ष ने विनियोग विधियेक की प्रमाणित प्रति राज्यपाल के पास भेजी है। इसलिए यह स्वाभाविक है कि विनियोग विधेयक को राज्यपाल की मंजूरी नहीं मिली है।

इस तरह विनियोग विधेयक पर कथित चर्चा और उसके पारित होने संबंधी सभी तथ्य साफ तौर पर इसके पारित न होने की ओर इशारा करते हैं। विनियोग विधेयक के बारे में गंभीर आशंका है। विनियोग विधेयक पारित न होने पर सरकार को 18 मार्च को ही इस्तीफा दे देना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया है, इसके परिणामस्वरूप राज्य में पूरी तरह संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। आज की तारीख में विधानसभा अध्यक्ष द्वारा प्रमाणित और राज्यपाल की मंजूरीप्राप्त विनियोग विधेयक नहीं है। अगर विधानसभा अध्यक्ष की बात को सही मानें कि बागी विधायकों ने विनियोग विधेयक के पक्ष में मतदान किया इसलिए यह पारित हो गया है तब बागी विधायकों को अयोग्य करार नहीं दिया जा सकता।

विनियोग विधेयक पारित न होने पर इस्तीफा नहीं देकर सत्ता में बने रहकर राज्य को गंभीर संवैधानिक संकट में धकेलने के बाद मुख्यमंत्री ने सदन में संख्याबल को प्रभावित करने के लिए विधायकों को प्रलोभन, खरीद फरोख्त और अयोग्य करार घोषित कराने की कवायद शुरु कर दी। विधान सभा को निलंबित करने का फैसला सार्वजनिक होने के बावजूद विधान सभा अध्यक्ष ने कुछ सदस्यों को निलंबित कर दिया है। इस तरह इस कार्रवाई के बाद संवैधानिक संकट और बढ़ गया है।

18 मार्च को बहुमत को अल्पमत में बदल दिया गया और 27 मार्च को संविधान का उल्लंघन कर एक अल्पमत की सरकार को बहुमत की बनाने के लिए सदन में संख्याबल को बदलने का प्रयास किया गया। एक विधान सभा अध्यक्ष द्वारा असफल विनियोग विधेयक को पारित घोषित करने और उसके बाद उसकी वैधानिकता को साबित करने में विफल रहने का यह अभूतपूर्व उदाहरण है। इस घटनाक्रम के बाद राज्य में एक अप्रैल 2016 से खर्च करने के लिए विधान सभा से पारित कोई बजट नहीं है। संवैधानिक संकट का इससे बेहतर सबूत क्या हो सकता है? उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार 18 मार्च से 27 मार्च के दौरान हर दिन लोकतंत्र की हत्या कर रही थी। अब केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि संविधान के अनुच्छेद 357 के तहत कदम उठाकर राज्य के लिए एक अप्रैल 2016 से राज्य में व्यय की मंजूरी सुनिश्चित की जाए।





A STATE WITHOUT A BUDGET

-Arun Jaitley


President’s Rule has been imposed in the State of Uttarakhand. Article 356 of the Constitution can be invoked only if the President is satisfied that there are grounds for believing that the governance of the State cannot be carried on in accordance with the Constitution.

The Congress party in the State of Uttarakhand split after a section of the leadership alleged that they were dis-satisfied both with the Chief Minister and the central leadership of the Congress party. The split was on account of reasons internal to the Congress party. Nine Members of the Congress party in the Legislative Assembly decided to vote against the Appropriation Bill which provides for the budget of the State. On 18th March 2016, it appears that 35 Members voted against the Appropriation Bill and 32 in favour. These 35 Members comprised of 27 from the BJP and 9 rebel Congress men. There is documentary evidence both prior and subsequent to the Assembly Session to suggest that these 35 Members asked for a Division of Votes. The proceedings of the Assembly circulated in writing establishes the charge that a Division was asked for and yet it was claimed that the Appropriation Bill has been passed without a vote.

There are strong facts to suggest that the Appropriation Bill was actually defeated. As a consequence, the Government had to resign. Two further consequences flow out of this. Firstly, the Appropriation Bill sanctioning expenditure from 1st April 2016 was not approved and, secondly, if the Appropriation Bill was defeated, the continuation of the Government subsequent to 18th March 2016 is unconstitutional. It is to be noted that till today, neither the Chief Minister nor the Speaker have forwarded a certified copy of the Appropriation Bill to the Governor. Obviously, there is no assent of the Governor to the Appropriation Bill.

In any case, all facts surrounding the alleged discussion and passage of the Appropriation Bill clearly indicate its non-passage. There is a cloud and a serious doubt about the Appropriation Bill. There is a complete breakdown of the Constitutional machinery in as much as the Government, which should have resigned on the 18th of March with the failure of Appropriation Bill, has decided to continue. As of today there is no Appropriation Bill certified by the Speaker which has received assent of the Governor. If it is Speaker’s case that the rebels voted in favour of the Appropriation Bill and, hence, it has been passed, then the rebels could not have been disqualified.

Having plunged the State into a serious Constitutional crisis by continuing a Government which should have quit after the failure of the Appropriation Bill, and further complicating the crisis the Chief Minister started allurement, horse-trading and disqualification with a view to altering the composition of the House. After the Assembly has been put under suspended animation and the decision has been made public, the Speaker has decided to disqualify some Members. The Constitutional breakdown has been compounded further by this action. On 18th March the majority was declared to be a minority and vice versa, and on 27th March the composition of the House was attempted to be changed in violation of the Constitution to convert a minority into a majority. This is an unprecedented case of a Speaker declaring a failed Appropriation Bill as passed and then failing to certify falsehood. This leaves the State without any approved financial expenditure with effect from 1st April 2016. What better evidence do we need of a breakdown of Constitution? The Congress Government of Uttarakhand was murdering democracy every day from the 18th of March till the 27th of March. It is now incumbent upon the Central Government to ensure that steps are taken under Article 357 to authorise expenditure of the State with effect from 1st April 2016.

Sunday, March 27, 2016

भय में होली का त्यौहार

सुनील कुमार
 
भारत में एक माह पहले से होली की तैयारी चलती हैं सभी खुशी खुशी होली का त्यौहार मनाते हैं होली के एक सप्ताह पहले ऑफिसों, कॉलेजों, स्कूलों में होली के चर्चे होने लगते हैं। सड़क पर बच्चे गुब्बारे मारते हैं लेकिन शाहाबाद डेरी बंगाली बस्ती के कबाड़ी वालों के लिये यह सप्ताह भय में बीत रहा है कि वह होली खेल पायेंगे या नहीं। रंजित रविदास को भय है कि कहीं इस बार की होली कहीं बंगाली बस्ती में रहने वालों के लिए कही खून की होली न बन जाये।
शाहबाद डेरी की दूसरी तरफ बंगाली बस्ती है। इस बस्ती में 99 प्रतिशत पश्चिम बंगाल से हैं और कूड़े का काम (घरों से कूड़े उठाना, रास्ते, इंडस्ट्रियल एरिया से कूड़े चुनना) करते हैं। सरकार ‘स्वच्छता अभियान’ का नारे देकर या कुछ फोटो-सोटो खिंचवा कर भूल गई उसको यह कूड़े वाले अपने रोजी-रोटी के लिये ही सही इस अभियान को फ्री में लागू कर रहे हैं। इनको कूड़े उठाने के लिये कोई पैसा नहीं मिलता (घरों से कूड़ा उठाने का जो पैसा मिलता है वह भी इनके जेब में नहीं जाता है)। सड़क पर, इंडस्ट्रियल एरिया और इधर-उधर जो कूड़ा बिखरा होता है उसके लिये इनको कोई मजदूरी नहीं मिलती अगर कुछ मिलता है तो ‘गंदे लोग’ की उपाधि। इन कूड़ा उठाने/बिनने वाले के साथ सभी जाति और धर्म के लोगों द्वारा भेद-भाव किया जाता है। यह अपने रिक्शों से या पीठ पर कूड़े को लाद कर घर ले जाते हुये दिख जाते हैं अगर यह थके हो और बस या कोई पब्लिक वाहन (खाली भी हो तो) से अपने कूड़े के साथ घर जाना चाहे तो उनको इन वाहनों में यात्रा नहीं करने दिया जाता है। कूड़े के ढेर में ही इनकी जिन्दगी का गुजारा होता है।
इस तरह कि जिन्दगी के बाद भी इन लोगों का किसी से कोई शिकायत नहीं है। वह अपने परिवार के साथ अपनी जिन्दगी में खुश हैं लेकिन उनकी यह खुशी भी कुछ धनपिपाशुओं द्वारा छिनने की कोशिश की जा रही है। इनके बस्ती के आस-पास फैक्ट्री, गोदाम बने हैं तो कुछ ऐसे ही खाली चारदीवारी बना कर छोड़ दिये गये हैं। इनकी झुग्गी बस्ती को नरेन्द्र राणा ने 10 साल पहले बसाया था जब से वह इस जमीन पर रहते आ रहे हैं। इन्ही बस्ती में स्माईल शेख, मेहरूद्दीन, चुमकी, कबरू, रंजित रविदास, राजेन्द्र आदि की झुग्गियां हैं जिसके सामने फैक्ट्री हैं। फैक्ट्री मालिक कौन है, इस फैक्ट्री में क्या बनता है इन बस्ती वालों को नहीं पता लेकिन यह फैक्ट्री मालिक लगातार फैक्ट्री के सामने की जमीन पर अपना दावा करता आया है। बस्ती वालों द्वारा जमीन का कागज दिखाने के कहने पर कभी कागज दिखाया नहीं गया। बस्ती में 18 तारीख को सुबह 4 बजे आग लगा दिया गया। इसमें कई घर आग में स्वाहा हो गये।
समई जो कि अपने परिवार के साथ रहते हैं बताते हैं कि सुबह वह नित्यकर्म करने के लिये गये थे तभी बस्ती में आग लग गई। समई घर के परिवार तो बाहर सुरक्षित निकल गये लेकिन उनके घर का सभी समान आग में स्वाहा हो गया और इकट्ठा किया हुआ कबाड़ जल कर खाक हो गया। घर में किस्त पर लिये फ्रीज और टीवी भी जल कर स्वाहा हो गये।
चुमकी अपने बच्चे कुसुम, रेशमा, अशरफ के साथ रहती है। वह अपने बच्चों की पालन-पोषण के लिये रोहणी सेक्टर 13 के घरों में काम करती है और अपने बच्चों और अपने लिये दो जून की रोटी की व्यवस्था करती है। चुमकी का रो रो के गले बैठ गया हैं। उसके घर का कोई भी समान नहीं बचा है जो कपड़े उसके शरीर पर है वही बचा हुआ है। कुसुम और रेशमा चौथी कक्षा में पढ़ती है जिनकी परीक्षा चल रही है उनके किताब, कॉपी जल गये हैं वह परीक्षा देने नहीं गई। पास में बैठी रेशमा बताती है कि मैंने ‘‘मैडम को खबर भेजा था लेकिन उन्होंने कोई खबर नहीं दिया।’’ चुमकी को चिंता है कि कैसे वह अपने बच्चों के लिये फिर से कपड़े, किताब खरीद पायेगी। उसको बस एक ही सहारा दिखाई दे रहा है कि जिन घरों में काम करती है शायद वहां से कोई सहायता मिल जाये।
रहीमा के पिता मेहरूद्दीन और भाई कूड़े का काम करते हैं। पिता घर (बंगाल) गये हुये हैं वह 19 को ट्रेन में थे लेकिन आग के बारे में उनको जानकारी नही दी गई है। रहीमा बताती है कि एक साल का कबाड़ इक्ट्ठा करके रखा हुआ था ताकि इसको एक साथ बेचकर बहन की शादी करना था। एक साल से कबाड़े कि किमत कम हो गई है आशा था कि जब कबाड़े का थोड़ा दाम अच्छा होगा तो इसको बेचा जायेगा। घर के खर्च चलाने के लिये वह सुखी रोटी और कुछ थोड़े बहुत कबाड़ी बेच कर अपना काम चलाते थे लेकिन अब वह सारे कबाड़ जल कर खाक हो गये। रहीमा बताती है कि 8-10 बकरी और 8-10 मुर्गे भी जल गये हैं जो कि होली में बेचने वाले थे। घर में एक भी समान नहीं बचा है कि वह लोग खाना बना सकें। इतने नुकसान होने के कारण ही रहीमा ने आग की जानकारी पिता को नहीं दी कि पता नहीं वो इस नुकसान को बर्दास्त कर पायेंगे या नहीं।
राजेन्द्र और उनकी पत्नी फैक्ट्री में काम करते हैं वे लोग सुबह-सुबह जाकर सड़क से कबाड़ इक्ट्ठा करते थे। काम करने से जो पैसा मिलता था उससे परिवार चलता था और दो साल से कबाड़ इक्ट्ठा किये थे कि इसको एक साथ बेच कर कुछ काम कर सकते हैं लेकिन उनकी यह आशा उस आग में जलकर खाक हो गई।
रंजित रविदास 7-8 माह से इस बस्ती में रहने आये थे इसके पहले वह 20 साल से जहांगीरपुरी में रहते थे जहां उनको बेटा नशे का शिकार हो गया था। रंजित को आशा था कि यहां रहकर वह अपने बेटे को सुधार सकते है और अपने रिश्तेदार के कहने पर जहांगीरपुरी से शहाबाद बंगाली बस्ती में आ गये। उनके घर का सारा समान जल कर खाक हो गया।
इतने नुकसान सहने के बाद भी बस्ती वालों ने कोई शिकायत नहीं किया किसी से और उसे प्राकृतिक आपदा समझ भुला देने की कोशिश की और अपनी जले हुई झोपड़ी को ठीक करने लगे। उनके पास कोई नेता या किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं पहुंची। बस्ती के लोगों ने ही मिल कर आग को बुझाया और आपस में चंदा इक्ट्ठा कर खाने की व्यवस्था कि और रिश्तेदारों, मुहल्ले वालों की मद्द से कुछ कपड़े पैसे इक्ट्ठे कर बल्ली, बांस लाये। जब वह जले हुये राख को हटा कर बल्ली, बांस से अपने लिये झोपड़ी तैयार कर रहे थे उस समय चार गाड़ी और बाईक पर कुछ गुंडे आये और मार-पीट शुरू कर दिया। शकीकुल शेख जो कि उसी बस्ती में रहते हैं अपने साली चुमकी को कपड़ा देने आये थे उन पर गुंडों ने बल्ली से हमला किया जिससे उनकी हाथ टूट गया। जिनको लेकर वे लोग खुद डॉ. अम्बेडकर अस्पातल रोेहणी में गये जहां प्लास्टर चढ़ा है और आगे डॉ ने कहा है कि इसमें राड डालना पड़ेगा।
शकीकुल के चार छोटे बच्चे हैं घर में वे और उनका एक बड़ा बेटा कमाता था। शकीकुल को अब अपनी अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है कि वह इस टूटे हुये हाथ से कैसे काम कर पायेंगे उनके बच्चों का क्या होगा। शकीकुल रोते हुये पूछते हैं कि आपका हाथ तोड़ देगा तो आप बोझ उठा पाओगे?
जब वह गुंडे और लोगों पर हमला किया तो पूरे बस्ती के लोग इकट्ठा होकर गुंडों का प्रतिकार किया जिसके बाद वह फायरिंग करते हुये भाग खड़े हुये। यह सभी घटना दो पुलिस वाले की मौजूदगी में हुई। बाद में काफी संख्या में पुलिस वालों ने पहुंच कर इन बस्ती वालों को मारना-पीटना शुरू कर दिया। घरों से महिलाओं को खिंचा और थाने ले जाने कि कोशिश की। बबलू शेख जो अपने रिश्तेदार के लिये कपड़े लेकर आये थे उनको जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया लेकिन बस्ती वालों की एकजुटता के सामने पुलिस को उन्हें छोड़ना पड़ा। जो दो पुलिस वाले वहां मौजूद थे वे उन महिलाओं और पुरुषों को खोज-खोज कर निशाना बनाना शुय किया जो उन गुंडों के प्रतिकार में आगे थे, महिलाओं को भद्दी गालियां दे रहे थे। हनिफा बिबि बताती है कि पुलिस वाले महिलाओं को ‘‘रन्डी की औलाद, .......में लात घुसा देंगे, फिल्म बनायेंगे’’ इस तरह की भद्दी भद्दी गालियां दे रहे थे। पुलिस डंडो और किल्ली (विकेट) से इन बस्ती वालों पर हमला कर रहे थे। बस्ती वालों ने बताया कि गुंडे गोली चला रहे थे तो वहां मौजुद पुलिस वालों ने कहा कि हमने तुमको पत्थर चलाते देखा है और कुछ नहीं देखा। जब पुलिस को 4 गोली के खोखे दिये गये तो बोला कि ‘‘क्या हुआ कोई मरा तो नहीं’’।
बाद में दस लोगों (5 महिला, 5 पुरुष) का मेडिकल कराया गया। गुंडे जाते हुये धमकी देकर गये कि हम तुमको यहां रहने नहीं देंगे। डर के कारण लोग घरों में नहीं सो रहे हैं। खुले मैदान में या एक छत हैं वहां उस पर बैठ कर रात को बस्ती वाले पहरा देते हैं।
इस कांड में अभी तक एक भी गिरफ्तारी नहीं हुई है और न ही इनको किसी तरह की मुआवजा मिला है। इनको झूठी आश्वासन देने के लिए भी कोई नेता और ना ही कोई प्रशासनिक अधिकारी इनके पास गया। आज भी बंगाली बस्ती के लोग डरे सहमे हुये घरों से बाहर सो रहे हैं उनको डर है कि कहीं ये होली उनके लिये कोई अनहोनी न कर दे। रंजित रविदास के शब्दों में होली खेलेंगे या खून की होली खेलेंगे। क्या इन बस्ती वालों को रहने का अधिकार नहीं है क्या इनके लिये भी कोई कानून संविधान, कोई भारत माता के रखवाले हैं? अपने गंदे में रहकर दुसरे को स्वच्छ रखने वालों पर हुये अत्याचार की सुनवाई की जायेगी? इनके जान-माल की सुरक्षा की गारंटी और इंसाफ मिल पायेगा?